
भोपाल। टोक्यो में हुए पैरा ओलंपिक के कैनो इवेंट में प्राची यादव देश का प्रतिनिधित्व किया। प्राची का यहां तक पहुंचने का सफर आसान नहीं था। प्राची यादव ने बताया कि जन्म से दोनों पैर खराब थे। 2007 में 8 साल की उम्र में बतौर एक्सरसाइज तैराकी से जुड़ी। इसी साल नेशनल चैंपियनशिप में खेलने का भी मौका मिला। जूनियर कैटेगरी में गोल्ड जीता। इस जीत से उनकी खेल के प्रति रुचि और आत्मविश्वास बढ़ा लेकिन घर की बदहाल स्थिति और आने-जाने की परेशानी के चलते खेल से दूर हो गई। 8 साल के लंबे अंतराल के बाद कोचिंग करना शुरू की।
2019 में जीता पहला मेडल
प्राची ने बताया कि 2015 में मैंने फिर से स्वीमिंग शुरू की, सीनियर कैटेगरी में नेशनल में मेडल भी जीत रही थी, लेकिन परफॉर्मेंस इतनी अच्छी भी नहीं थी कि मैं इंटरनेशनल लेवल पर अपने आपको रिप्रजेंट कर सकूं। कोच ने मुझे खेल बदलने की सलाह दी। उन्होंने हाथ लंबे है तो कैनो ट्राय करो। मैं भोपाल आकर इसे देखा तो लगा कि मुझे ये खेल खेलना चाहिए। मैंने महेन्द्र ठाकुर सर से प्रशिक्षण लेना शुरू किया करीब डेढ़ साल में इसे सीखा। 2019 में मैंने पहला नेशनल खेला और एक गोल्ड, एक सिल्वर जीता। इसके बाद इंटरनेशनल में सिलेक्शन हुआ, पौलेंड में वीएल-2 में 200 मीटर स्पर्धा में मैं 8वें स्थान पर रही। मुझे जगा कि यदि मैं ओर सख्त प्रशिक्षण लूं तो ओलंपिक के लिए सलेक्ट हो सकती हूं। वल्र्ड चैंपियनशिप में टॉप-10 में रही।
बोट खरीदने के नहीं थे पैसे
प्राची ने बताया कि कैनो बोट करीब 5 लाख और चप्पू 25 हजार का आता है। जब प्रैक्टिस शुरू की तो इतना पैसा नहीं था कि ये खरीद सकूं। दो नॉर्मल बोट को जोड़कर उस पर प्रैक्टिस करती थी, चप्पू भी साधारण था उसे काटकर कैनो लायक बनाया। इसके बाद जब इंटरनेशनल के लिए सलेक्ट हुई तो ठाकुर ने फॉरन बोट बनाकर दी। इसके लिए आधा खर्च उन्हें उठाया, आधी के लिए लायन्स क्लब व अन्य से मदद मिली। तीन साल तक जुगाड़ की बोट से प्रैक्टिस करती रही। प्राची ने बताया कि जुगाड़ की बोट में प्रैक्टिस की समस्या है कि यह सीधी नहीं चलती। हालांकि इससे फायदा भी मिला कि ये बोट कैनो की बोट 5 से 8 किलोग्राम तक भारी है। इससे प्रैक्टिस करने से मेरा स्टेमिना बढ़ गया। अब हल्की बोट के साथ उतरूंगी तो रफ्तार तेज हो जाएगी। अभी भी मेरे पास बोट नहीं है, एक सीनियर प्लेयर अनुज सिंह की बोट से तैयारी कर रही हूं।