MP News: पिछले कुछ सालों से मप्र में कुछ अफसरों में भी बेलगाम जैसी कार्यप्रणाली दिखी है। कुछ तहसीलदारों द्वारा पिछले रबी सीजन में खाद वितरण के समय किसानों के साथ की गई खुली अभद्रता व मारपीट इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
MP News: नेताओं व अफसरों के बीच तीखी कहा-सुनी और विवाद का चलन मप्र में गति पकड़ रहा है। पहले आइएएस संजीव श्रीवास्तव और भिंड से भाजपा विधायक नरेंद्र सिंह कुशवाहा का विवाद सुर्खियां बटोर चुका है। हाल में पिछोर से भाजपा विधायक प्रीतम लोधी का एसडीओपी और मंत्री नागर सिंह चौहान के भाई इंदर सिंह चौहान का आलीराजपुर जनपद पंचायत सीईओ के साथ सामने आया विवाद कई राज्यों में चर्चा का विषय बना है। आमतौर पर इन विवादों के लिए नेताओं को ही जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है, लेकिन विशेषज्ञों की राय में यह पूरी तरह सही नहीं है।
पिछले कुछ सालों से मप्र में कुछ अफसरों में भी बेलगाम जैसी कार्यप्रणाली दिखी है। कुछ तहसीलदारों द्वारा पिछले रबी सीजन में खाद वितरण के समय किसानों के साथ की गई खुली अभद्रता व मारपीट इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसी घटनाओं से न केवल प्रदेश की छवि पर विपरीत असर पड़ा बल्कि आम जनता का नुकसान भी हुआ। आमतौर पर सुलझे हुए अफसर कभी भी उलझते नहीं है, बल्कि उलझनों को बड़े से बड़े संकट की स्थिति में दूर करते हैं। इसका असर आम लोगों पर अधिक दिखता है। अफसर-नेता के बीच जनता पिस रही है।
जनप्रतिनिधियों की सुनवाई नहीं होना: अंदरखाने यह चर्चा है कि इन दिनों कई नेताओं की ही सुनवाई नहीं हो रही। ऐसा इसलिए योंकि कुछ अफसरों को सीधे बड़े जनप्रतिनिधियों का संरक्षण है। इस वजह से द्वंद बढ़ रहा है।
प्रभाव कम होना: पूर्व में नेता व अफसरों के बीच होने वाले विवादों को गंभीरता से लिया जाता था। विवाद के लिए जिम्मेदार की जिम्मेदारी तय होती थी। अब ऐसा कम हो रहा।
जनता का दबाव: पहले से कम लेकिन अभी भी लोगों की पहुंच जनप्रतिनिधियों तक है। वे समस्या बताकर निराकरण चाहते हैं। हल नहीं निकलने पर संबंधित जनप्रतिनिधि को नजर अंदाज करते हैं या किसी न किसी रूप में गुस्सा जाहिर करते हैं। ऐसे जनप्रतिनिधि अफसरों पर गुस्सा निकालते हैं, जिसे आज की अफसरशाही का एक तबका बर्दाश्त करने की बजाए खुद के खिलाफ मान रहा।
शिवपुरी के करैरा सीट से विधायक प्रीतम लोधी के बेटे दिनेश की रंगदारी का हालही में मामला सामने आया। बेटे पर केस के बाद विधायक ने अभद्रता की।
कई अफसर नेताओं के बंगले पर चक्कर लगाते हैं, जब तक सब कुछ ठीक रहता है तब तक कोई बात सामने नहीं आती। बात बिगडऩे पर आरोप प्रत्यारोप सामने आते हैं। नेताओं के बंगलों पर जाना छोडऩा होगा। - विजय दत्त श्रीधर, राजनीतिक
ज्यादातर मामलों में विवाद करने वाले नेता और अफसर दोनों ही जिम्मेदार है। इसमें आम जनता का नुकसान हो रहा है। कमोवेश मप्र में यह स्थिति बढ़ती जा रही है, जो ठीक बात नहीं है। - महेश श्रीवास्तव, प्रशासनिक
नेता और अफसरों अपने अधिकार जान लें तो विवाद को काफी हद तक टाला जा सकता है। दोनों एक दूसरे से अपेक्षा करते हैं, जिसमें यह भी देखना चाहिए कि संबंधित काम कानूनी दृष्टि से कितना वाजिब है। - गिरिजाशंकर, प्रशासनिक