भोपाल

विचलित कर देगी तस्वीर : लॉकडाउन में भूख के कारण 70 साल के बुजुर्ग की मौत, सड़क पर पड़ा था शव

लॉकडाउन लोगों को संक्रमण से बचाने का तो बेहतर तरीका है, लेकिन इसका विपरीत असर कई गरीब-मज़दूरों पर पड़ रहा है।

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विचलित कर देगी तस्वीर : लॉकडाउन में भूख के कारण 70 साल के बुजुर्ग की मौत, सड़क पर पड़ा था शव

भोपाल/ मध्य प्रदेश में कोरोना वायरस बहुत तेजी से अपने पांव पसार रहा है। मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक, प्रदेश में अब तक 2387 कोरोना के पॉजिटिव मरीज सामने आ चुके हैं, जबकि मृतकों की संख्या 120 पार कर चुकी है। ये हालात उस समय हैं जब केन्द्र और राज्य सरकार द्वारा देश-प्रदेश में लॉकडाउन किया गया है। संक्रमितों का लगातार तेजी से बढ़ता आंकड़ा उस समय का है, जब पूरा देश अपने घरों में कैद है। फिर जरा सोचिये कि, अगर लॉकडाउन न किया गया होता तो हालात क्या होते? यानी कुल मिलाकर संक्रमण का फोरी बचाव लॉकडाउन करके सोशल डिस्टेंसिंग को मेंटेन रखना है, ताकि इसका प्रभाव बड़ी आबादी तक पहुंचने से रोका जाए। लॉकडाउन लोगों को संक्रमण से बचाने का तो बेहतर तरीका है, लेकिन इसका विपरीत असर कई गरीब-मजूदरो पर पड़ रहा है।


ये था बुजुर्ग की मौत का कारण

वैसे तो लॉकडाउन के कारण देशभर के गरीब-मजदूरों के सामने मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है। देश में ऐसे करोड़ों लोग हैं, जो मजदूरी करके रोजाना की कमाई के आधार पर अपनी आजीविका चलाते हैं। ऐसे कई लाखों लोग हैं, जो भीख मांगकर अपना गुजारा करने को मजबूर हैं। इनमें कुछ माजूर हैं, और कुछ आदत से मजबूर हैं, जो इस तरह अपनी आजीविका चलाते हैं। हालांकि, ये सभी लोग लॉकडाउन के कारण बड़े संकट से जूझ रहे हैं। राजधानी भोपाल से ही एक ऐसी विचलित कर देने वाली तस्वीर सामने आई, जो इस समय जिम्मेदारों के लिए बड़ा सवाल खड़ा करती है। दरअसल, सोमवार को शहर के नादरा बस स्टेंड यानी मुख्य शहर के सड़क किनारे एक अज्ञात शव पड़ा था। शव बुजुर्ग का था, देखने से मालूम हो रहा था, मानों कोई 70 साल का बुजुर्ग रहा होगा। आसपास के लोगों ने बताया कि, बुजुर्ग की मौत का कारण उसकी भूख थी।

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इस वजह से गई बुजुर्ग की जान


प्राप्त जानकारी के अनुसार, बुजुर्ग हमेशा बस स्टेंड से रेलवे स्टेशन के बीच मार्ग पर भीख मांगकर अपना गुजारा किया करता था। कुछ लोगों ने तो यहां तक बताया कि, जब से लॉकडाउन लगा है, तभी से उसके सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया था। क्योंकि, बस स्टेंड से लेकर रेलवे स्टेशन तक न तो कोई सवारी थी, जिससे वो भीख मांगता और न ही शहर भर में कहीं कोई खाने पीने की होटल खुली थी, जहां से भोजन मांगकर वो अपने पेट की आग को बुझा पाता। एक दो दिन में कोई भला मानस उसे कुछ खाने को दे देता तो सड़क के किनारे फुटपाथ पर पड़े रहकर खा लेता। पर बुजुर्ग हाथ पेरों में इतनी जान कहां थी कि, दो-तीन दिनों के भीतर मिलने वाले कुछ खाने के जरिये हाथ-पैरों के लिए कुछ दम भर पाता।


शख्स ने सुनाया आंखों देखा हाल

जानकारी देने वाला शख्स भी उसी बस स्टेंड के फुटपाथ पर भीख मांगकर गुजारा करता है। वो उस मरते हुए बुजुर्ग की मदद इसलिए नहीं कर पाया क्योंकि, उसके पास खुद भी बुजुर्ग की मदद करने के लिए कुछ नहीं था। उसने बताया कि, बीते तीन दिनों से तो बुजुर्ग उसी जगह पर पड़ा था, जहां से आज पुलिस उसे मृत अवस्था में उठाकर ले गई हैं। अब वो मरा कब होगा, ये तो पुलिस और जांच करने वाले डॉक्टर ही जानें।


महत्वपूर्ण है ये जानकारी

इस भावुक कहानी को सुनाकर आपकों उस बुजुर्ग की ही पीड़ा सुनाने का मकसद नहीं था। उस बुजुर्ग की मौत ने तो शायद उसकी पीड़ा को खत्म कर दिया, लेकिन इस लॉकडाउन के कारण ऐसे कई लोग हैं, जो लगभग ऐसी ही पीड़ा का सामना रोजाना कर रहे हैं। सवाल ये है कि, जिन जिम्मेदारों के पास सड़क से वाहन लेकर गुजरने वाले हर शख्स का रिकॉर्ड है, किस इलाके में कितने कोरोना संक्रमित और कितने अन्य बीमारियों से ग्रस्त लोगों का रिकॉर्ड है, शहर की सीमा में किस व्यक्ति ने कहां से प्रवेश लिया है इसका रिकॉर्ड हैं, तो फिर ऐसे गरीब, मांगकर गुजारा करने वालों का कोई पुख्ता रिकॉर्ड क्यों नहीं है। अब वो बुजुर्ग भीख मांगकर गुजारा करने वाला गरीब था, ये सोचकर उसकी मौत को नज़रअंजाद तो नहीं किया जा सकता न, वो भी एक इंसान ही था।

Published on:
29 Apr 2020 06:25 am