
Bhojshala Supreme Court: नई दिल्ली देश के सबसे चर्चित और संवेदनशील विवादों में से एक धार भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद मामले में अब देश की सर्वोच्च अदालत न्याय का अंतिम अध्याय लिखने को तैयार है। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के उस ऐतिहासिक फैसले के खिलाफ, जिसमें इस परिसर को स्पष्ट रूप से 11वीं सदी का वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर माना गया था, मुस्लिम पक्ष ने देश की सबसे बड़ी अदालत का दरवाजा खटखटाया है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं पर सुनवाई के लिए हामी भर दी, जिसके बाद अब राजधानी के कानूनी गलियारों में हलचल तेज हो गई है।
हाई कोर्ट ने कुछ समय पहले इस पूरे परिसर में देवी सरस्वती के प्राचीन मंदिर पर बड़ा निर्णय लिया था। मुस्लिम पक्ष ने उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। सोमवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के सामने लोधी वाली पीठ के मुस्लिम पक्ष के वकीलों ने जल्द सुनवाई की मांग रखी। कोर्ट ने उत्पादों को कुछ तकनीकी कमियां दूर करने को कहा और बताया कि मामले को जल्द ही सामने दर्ज किया जाएगा। दूसरी तरफ हिंदू पक्ष भी शामिल है। उन्होंने कैविएट की अर्जी कर दी है, ताकि उनका पक्ष सुने बिना कोई आदेश न निकले।
15 मई को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट और वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर कहा था कि भोजशाला 11वीं सदी का स्मारक है। यह राजा भोज द्वारा स्थापित संस्कृत का शिक्षा केंद्र और देवी सरस्वती का मंदिर था।
कोर्ट ने 2003 के उस पुराने आदेश को भी रद्द कर दिया था, जिसमें हिंदुओं को मंगलवार को पूजा और मुसलमानों को शुक्रवार को नमाज की इजाज़त दी गई थी। साथ ही मुस्लिम पक्ष को लेकर मस्जिद के लिए धार जिले में अलग-अलग जगहों पर विचार करने को कहा गया था।
हाई कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की वैज्ञानिकता पर भी काफी सख्त टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कहा कि विभाग ने अपनी अनुकूलता में उद्योग-धंधे बनाए हैं। एएसआई को अब इस परिसर की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी सौंपी गई है।
कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया कि लंदन के किसी भी पवित्र मंदिर में संरक्षित देवी सरस्वती की मूल मूर्ति को वापस यहां स्थापित करने पर विचार किया जाए।