13 जुलाई 2026,

सोमवार

Patrika Logo
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

एमपी के किसी जिला अस्पताल में न माइक्रोबायोलॉजी लैब न एक्सपर्ट, अनुभव से डॉक्टर दे रहे रिजर्व श्रेणी के एंटीबायोटिक्स

District hospitals in MP : NHM की क्वालिटी एश्योरेंस यूनिट ने दो सरकारी और 8 निजी अस्पतालों में 864 मरीजों पर सर्वे किया, अध्ययन में सामने आई हैरान कर देने वाली हकीकत। नतीजा..मरीजों का रेजिस्टेंस बढ़ा।
2 min read
Google source verification
District hospitals in MP

District hospitals in MP (NHM के सर्वे में बड़ा खुलासा photo Source- Patrika)

MP News :मध्य प्रदेश के किसी भी जिला अस्पताल में प्रशिक्षित एमडी माइक्रोबायोलॉजिस्ट नहीं हैं। सिर्फ दो जिलों में कामचलाऊ माइक्रोबायोलॉजी लैब हैं। यहां भी एमडी पैथोलॉजी या एमएससी माइक्रोबायोलॉजी ही जांच कर रहे हैं। ऐसे में डॉक्टर अनुभव और लक्षणों के आधार पर मरीजों को एंटीबायोटिक्स लिख रहे हैं। इसका नतीजा ये है कि, रिजर्व और अंतिम विकल्प के तौर पर उपयोग होने वाले एंटीबायोटिक्स का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। इससे तेजी से एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस बढ़ रहा है। यह हकीकत एनएचएम एमपी की क्वालिटी एश्योरेंस यूनिट के अध्ययन में सामने आई है।

अब स्टेट एक्शन प्लान ऑन एंटी माइक्रोबियल रजिस्टेंस 2.0 में सभी जिलों में माइक्रोबायोलोजी लैब बनाने का प्रावधान किया है। लेकिन ये भी कब तक बनेंगी, तय नहीं है।

3 साल से रिपोर्ट दबाए रहा NHM

एंटीबायोटिक्स के लिए तय प्रोटोकॉल के अनुसार, मरीजों को संक्रमण की स्थिति में माइक्रोबायोलॉजी लैब में कल्चर टेस्ट करना है। इसमें एमडी माइक्रोबायोलॉजिस्ट जांच कर रिपोर्ट देंगे कि किस तरह के बैक्टीरिया का संक्रमण है। उसकी तीव्रता या प्रभाव कैसा है। इसके बाद डॉक्टर एंटीबायोटिक तय करते हैं। लेकिन, अस्पतालों में कल्चर टेस्ट की सुविधा न होने से डॉक्टर लक्षणों के आधार पर एंटीबायोटिक्स की डोज दे रहे हैं। हद तो ये है कि, तीन साल पहले से ही एनएचएम को ये पता है, लेकिन अब तक कोई समाधानात्मक कार्रवाई नहीं की।

सर्वे में अस्पतालों में मिली ऐसी हालत

एनएचएम की क्वालिटी एश्योरेंस यूनिट ने 8 निजी और 2 सरकारी जिला अस्पतालों में 864 मरीजों पर सर्वे किया। इसमें ओवरऑल एंटीबायोटिक्स का उपयोग काफी ज्यादा 78.9 फीसद पाया गया।

-अधिकांश एंटीबायोटिक्स अनुभव के आधार पर दिए गए, क्योंकि मरीजों में बैक्टीरियल कल्चर रेट बहुत कम 21.9 फीसद ही मिला। यानी, जो एंटीबायोटिक्स दिए जा रहे थे, उनकी जरूरत नहीं थी।

-जो एंटीबायोटिक्स लिखे गए, उनमें से 53.1 प्रतिशत डब्ल्यूएचओ वॉच श्रेणी से और 5.5 प्रतिशत रिजर्व श्रेणी से थीं। वॉच श्रेणी में ऐसे ब्रॉड-स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक्स शामिल हैं, जिनसे एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस का खतरा ज़्यादा होता है।

-इन दवाओं की सलाह सिर्फ कुछ खास और सीमित बीमारियों के इलाज में पहली या दूसरी पसंद के तौर पर दी जाती है। इन दवाओं को असरदार बनाए रखने के लिए यह जरूरी है।

-रिजर्व श्रेणी के एंटीबायोटिक्स आखिरी विकल्प में इस्तेमाल की जाती हैं। लेकिन, अस्पतालों में ऐसा नहीं हुआ।