
Bhopal Master Plan 2047 Update: राजधानी के मास्टर प्लान 2047 के ड्राफ्ट ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। ड्राफ्ट पर 25 अक्टूबर तक सुझाव आपत्तियां दी जा सकती हैं, लेकिन भ्रम की स्थिति बनी हुई है। विकास कार्यों के नाम पर दी जा रही पेड़ों की बलि के बीच ड्राफ्ट में सबसे ज्यादा भ्रम हरियाली को लेकर ही है। विशेषज्ञों का कहना है, 2005 के प्लान में निवेश क्षेत्र 601 वर्ग किमी और हरित क्षेत्र 16% था। नए ड्राफ्ट में निवेश क्षेत्र 1016 वर्ग किमी किया तो हरित क्षेत्र 27% ही किया है। यह नाकाफी है। निवेश क्षेत्र दोगुना हुआ है, हरित क्षेत्र भी दोगुना करना था। 11% हरित क्षेत्र बढ़ाना साफ करता है कि शहर से हरियाली कम होगी।
हथाईखेड़ा, शाहपुरा, केरवा, कालियासोत व कोलार के जलग्रहण क्षेत्रों में पार्क और क्षेत्रीय हरित क्षेत्र प्रस्तावित थे। 2047 के ड्राफ्ट में ये नहीं दिख रहा। ग्रोथ कॉरिडोर, स्लम रीहेबिलिटेशन प्रोजेक्ट में असीमित एफएआर है। लेकिन यह साफ नहीं है कि अधिक निर्माण से पानी, सीवेज व ट्रैफिक पर पड़ने वाले दबाव कैसे संभालेंगे। रातापानी टाइगर रिजर्व के बफर से जुड़े इको-सेंसेटिव जोन और ढलान पर निर्माण रोकने के प्रावधान साफ नहीं है। इसे अफसरों के विवेक पर छोड़ा गया है।
विशेषज्ञ कहते हैं, ड्राफ्ट में भानपुर के पुराने कचरा-स्थल पर गोल्फ कोर्स का प्रस्ताव है। गोल्फ कोर्स हरित उपयोग हो सकता है, लेकिन इसे आम लोगों के लिए खुले पार्क या सार्वजनिक पौधरोपण के बराबर नहीं माना जा सकता। ये केंद्र के सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट व खंती डिस्पोजल करने से जुड़े नियमों का उल्लंघन है। कोई भी खंती बंद करने के कम से कम 20 साल तक यहां खेल या अन्य गतिविधि नहीं की जा सकती है।
रातापानी टाइगर रिजर्व के बफर से जुड़े इको-सेंसिटिव जोन, ढलान पर निर्माण रोकने के नियम साफ नहीं हैं। पहाड़ियों के मामले में 1995 के प्लान ने 8 डिग्री से अधिक ढलान पर निर्माण रोकने और अरेरा, चार इमली, ईदगाह, सिंगारचोली, कालियासोत केरवा के आसपास की पहाड़ियों को उनके मूल स्वरूप में बचाने का निर्देश था। नए ड्राफ्ट में पहाड़ियों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट नियम नहीं हैं। अफसर अब अपने विवेक से इसपर निर्णय लेंगे।
भोपाल का टाइगर कॉरिडोर देशमें पहचान रखता है। लेकिन ड्राफ्ट में पक्षी अभयारण्य शब्द सामान्य भूमि-उपयोग श्रेणी के रूप में आया है। इसमें रातापानी टाइगर रिजर्व के के बफर क्षेत्र से जुड़ा इको-सेंसिटिव जोन एक नया और महत्वपूर्ण प्रस्ताव हो सकता है। इसमें वन्यजीवों के आने-जाने के रास्तों और उनके आवास की रक्षा के लिए स्पष्ट नियम बनाना जरूरी है।
ड्राफ्ट 2047 में में पुराने गैर-आवासीय उपयोगों को नियमित करने की व्यवस्था पर सवाल उठाना उचित है। इस पर जांच, सार्वजनिक चर्चा जरूरी है। हरित क्षेत्र 16 से 27 फीसदी का दावा संदिग्ध है। पहाड़ियों और इको-सेंसिटिव जोन के नियमों की पुष्टि करने की जरूरत है। जलस्रोतों व इको-सेंसिटिव जोन के बारे में 1995 की योजना से अधिक विस्तृत दिखता है, पर वास्तविक उपयोगिता इस पर निर्भर करेगी कि नियम कितने स्पष्ट हैं और उन्हें लागू कैसे किया जाता है।-प्रो. एचएम मिश्रा, टाउन प्लानर
मास्टर प्लान ड्राफ्ट में लैंडयूज के मनमाने उपयोग की छूट दी जा रही है। शहर को पर्यावरणीय दृष्टि से नहीं समझा गया। हरित संरक्षण या विकसित करने के स्पष्ट प्रावधान जरूरी है। बताना चाहिए कि शहर किस दिशा में बढ़ेगा। गैर हरित क्षेत्रों में निर्माण हो, पर वन-तालाब क्षेत्र में एफएआर बढ़ाना, पहाड़ियों पर निर्माण, पुरानी कॉलोनियों के री-डॅसिफिकेशन करना, ग्रीन एरिया खत्म करने जैसा है।-डॉ. राजेश सक्सेना, वरिष्ठ वैज्ञानिक, मेपकास्ट