भोपाल

शहर की चमक में थक गई ‘गौरैया मां’, ओवरटाइम कर रही, अकेले लड़ रही अस्तित्व की जंग

house sparrow struggle: भोपाल की 'ट्रॉपिकल इकोलॉजी एंड इवोल्यूशन लैब' के एक वैज्ञानिक अध्ययन (2021-24) में चौंकाने वाला खुलासा

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May 23, 2026
House Sparrow Survival Struggle (photo: patrika AI Edited)

House Sparrow Struggle: शहरीकरण और प्रदूषण अब गौरैया के दांपत्य जीवन और उनके परिवार नियोजन के लिए बड़ी आफत बन चुका है। भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर) भोपाल की 'ट्रॉपिकल इकोलॉजी एंड इवोल्यूशन लैब' के एक वैज्ञानिक अध्ययन (2021-24) में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। शहरों में रहने वाली मादा गौरैया को गांव की तुलना में कहीं ज्यादा ओवरटाइम यानी हाड़-तोड़ मेहनत करनी पड़ रही है, लेकिन इसके बावजूद गोरैया के बच्चों के जीवित बचने की दर (सर्वाइवल रेट) लगातार गिर रही है।

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अर्बन पेनल्टी का नाम दिया

वैज्ञानिकों ने इसे 'अर्बन पेनल्टी' का नाम दिया है। वैसे तो गौरैया के परिवार में बच्चे पालने की जिम्मेदारी माता-पिता दोनों की होती है, लेकिन शहरी चकाचौंध में 'शहरी पापा' गांवों की तुलना में थोड़े कम जिम्मेदार नजर आ रहे हैं। इससे पर्यावरण में मौजूद तनाव के कारण बच्चों के पालन-पोषण में मादा गोरैया को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ रही है।

मेहनत ज्यादा, नतीजा कम

Researchers tells Gauraiya Struggle Increased: शौधकर्ता बाएं से एग्नेस फ्रैंकलिन फ्रांसिला और प्रो. विनीता गौड़ा ने सुनाई गौरैया के स्ट्रगल की कहानी। (photo: patrika)

अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं (डॉ. एग्नेस फ्रैंकलिन फ्रांसिला और प्रो. विनीता गौड़ा) ने दिसंबर से जून के बीच 183 घोंसलों और 319 घंटों से अधिक के व्यवहार संबंधी डेटा का विश्लेषण किया। नतीजे बताते हैं कि शहरों में अत्यधिक रखवाली के बाद भी चूजों को बचाना मुश्किल हो रहा है।

टूट रहा उड़ने का सपना-

मापदंड - ग्रामीण इलाके - शहरी इलाके

-अंडे से बच्चे निकलने की दर - 62.5% - 54.7%

-उड़ने की सफलता - 63.1% - 41.2%

-घोंसलों में प्लास्टिक का दखल

ऑनिथॉलॉजिस्ट के अनुसार शहरी मादा गौरैया तिनकों की जगह प्लास्टिक और थर्माकोल से घोंसले बना रही हैं। इससे अंडों को सेने में दिक्कत हो सकती है और मां को ज्यादा समय घोंसले के अंदर बैठना पड़ता है।

-जंक फूड का बढ़ता चलन

ऑनिथॉलॉजिस्ट (पक्षी विज्ञानी) की मानें तो शहरों में इंसानों द्वारा फेंके गए पके चावल, तले स्नैक्स और फास्ट फूड खाकर गौरैया अपना और बच्चों का पेट तो भर रही हैं, लेकिन इसमें विकास के लिए जरूरी प्रोटीन और पोषक तत्व नहीं होते। इसके विपरीत, ग्रामीण गौरैया खेतों से प्राकृतिक अनाज और कीड़े-मकोड़े लाती हैं।

-गंभीर जेंडर असंतुलन, नर-प्रधान है शहरी गोरैया का समाज

शहरों में गौरैया का लिंग अनुपात 1.12 (नर-प्रधान) है, जबकि गांवों में यह 0.866 (मादा-प्रधान) है।

शहर के शिकारी और घोंसलों का सूनापन

शहरों में कौवे और बाज जैसे शिकारियों का खतरा 34.72 फीसदी है, जबकि गांवों में यह केवल 9.18 फीसदी है। गाड़ियों के शोर, लाइट पॉल्यूशन और मानवीय दखल के कारण शहरों में 56.64 फीसदी घोंसले बीच में ही छोड़ दिए जाते हैं, जबकि गांवों में यह दर सिर्फ 21.43 फीसदी है।

गांव बनाम शहर: वर्कलोड का अंतर

-पारिवारिक जिम्मेदारी

शहरी घोंसलों में गौरैया का कुल समय निवेश 26.4 मिनट प्रति घंटा है, जबकि ग्रामीण इलाकों में यह मात्र 20.1 मिनट है।

-मां का सुपरवुमन अवतार

शहरों में मादा गौरैया का कुल प्रयास 37.4 मिनट प्रति घंटा दर्ज किया गया, जबकि ग्रामीण मां का केवल 19.2 मिनट है।

गौरैया का बचना क्यों है जरूरी

-कुदरती पेस्ट कंट्रोलर:

मुख्य रूप से अल्फाल्फा कैटरपिलर और कीड़े-मकोड़े खिलाती है, जो फसलों और बगीचों को बर्बाद होने से बचाते हैं।

-पारिस्थितिकी तंत्र का आधार

यह खाद्य श्रृंखला का एक अहम हिस्सा है, इसकी कमी से पर्यावरण का संतुलन पूरी तरह बिगड़ सकता है।

-स्वास्थ्य की सटीक इंडिकेटर

इनकी घटती संख्या सीधा संकेत है वायु, ध्वनि और रेडिएशन प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है।

-अनाज के दानों का बिखराव

प्रकृति में बीजों को फैलाने और उन्हें दोबारा उगाने में चिड़िया अनजाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाती है।

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Published on:
23 May 2026 05:24 pm
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