Health news: एम्स में किडनी निकालने लेप्रोस्कोपिक डोनर नेफ्रेक्टोमी तकनीक अपनाई जाएगी।
Health news: अब किडनी फेल होने की स्थिति में बच्चों की जिंदगी बड़े शहरों के अस्पतालों पर निर्भर नहीं रहेगी। अब एम्स भोपाल में बाल डायलिसिस यूनिट बनकर तैयार है, जहां एम्स भोपाल में बच्चों के किडनी ट्रांसप्लांट की तैयारी पूरी हो चुकी है। केंद्रीय टीम के निरीक्षण के बाद जल्द ही मंजूरी मिलने की उम्मीद है।
इसके साथ ही प्रदेश में पहली बार यह जीवनरक्षक सुविधा शुरू हो जाएगी। एम्स प्रबंधन ने दावा किया है कि बच्चों के किडनी ट्रांसप्लांट के लिए सभी जरूरी इंतजाम पूरे कर लिए गए हैं। हाल ही में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की टीम ने भी अस्पताल का दौरा कर व्यवस्थाओं का जायजा लिया था।
एम्स में किडनी निकालने लेप्रोस्कोपिक डोनर नेफ्रेक्टोमी तकनीक अपनाई जाएगी। इसमें बड़ा चीरा नहीं लगाना पड़ता है। डोनर जल्दी रिकवर होता है। इससे ट्रांसप्लांट प्रक्रिया सुरक्षित और तेज होगी। बच्चों के ऑपरेशन के लिए जरूरतें अलग होती हैं। इसे ध्यान में रखते हुए यूनिट में उम्र और वजन के अनुसार, मशीनें और फिल्टर लगाए गए हैं। इससे इलाज ज्यादा सटीक और सुरक्षित होगा। 'वृक्कांकित 2.0' के जरिए बच्चों का पूरा मेडिकल रिकॉर्ड सुरक्षित रखा जाएगा। इससे लंबे इलाज की निगरानी आसान होगी और इलाज में निरंतरता बनी रहेगी।
मुफ्त इलाज से बड़ी राहत: आयुष्मान भारत योजना के तहत बच्चों का किडनी ट्रांसप्लांट और डायलिसिस निशुल्क किया जाएगा। इससे गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों को बड़ी राहत मिलेगी।
एम्स भोपाल में प्रदेश की पहली पीडियाट्रिक हीमोडायलिसिस यूनिट एक वर्ष पहले से बनकर तैयार है। इसमें एक साल में 1000 से ज्यादा डायलिसिस, 120 से अधिक प्लाज्मा एक्सचेंज, 4200 से ज्यादा बच्चों ने ओपीडी में इलाज करवाया है। आंकड़े बताते हैं कि बच्चों में किडनी रोग तेजी से बढ़ रहा है। क्लिनिक में डायलिसिस कराने वाले बच्चों की भीड़ कम करने एम्स में अब अभिभावकों को पेरिटोनियल डायलिसिस का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। 10 से ज्यादा परिवारों को प्रशिक्षण दी जा चुकी है। इससे बच्चों को बार-बार अस्पताल आने की जरूरत कम होगी।
बीते दिनों पहले ही भोपाल एम्स के डॉक्टरों ने मेडिकल रिसर्च के क्षेत्र में सफलता पाई है। उन्होंने मानव शरीर में एक ऐसी विशेष ग्रंथि का पता लगाया है, जिसके बारे में पहले पूरी जानकारी नहीं थी। यह खास ग्रंथि हमारी नाक के ठीक पीछे और गले के ऊपरी हिस्से (जिसे वैज्ञानिक भाषा में नासोफेरिंजियल क्षेत्र कहते हैं) में स्थित है। इस खोज की सबसे बड़ी और अहम बात यह है कि डॉक्टरों ने सिर्फ इस ग्रंथि को ही नहीं खोजा, बल्कि पहली बार इससे निकलने वाली नली को भी स्पष्ट रूप से दुनिया के सामने पेश किया है।