MP Toll VIP Exemption: मध्य प्रदेश में टोल टैक्स और VIP छूट पर छिड़ी बहस, नितिन गडकरी के बयान का असर, एमपी के 229 विधायक और 40 सांसद भी इस व्यवस्था का हिस्सा...
MP Toll VIP Exemption: देश में VIP कल्चर को खत्म करने की बात लंबे समय से होती रही है, लेकिन जब यही सवाल सत्ता के अंदर उठता है, तो जवाब भी उतने ही दिलचस्प हो जाते हैं। केंद्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी (Nitin Gadkari) का पिछले दिनों दिया गया एक बयान इन दिनों चर्चा में है, जिसने सिस्टम और विशेषाधिकारों को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। बता दें कि एमपी के 229 विधायक और 40 सांसद भी इस व्यस्था का अहम हिस्सा हैं। ऐसे में गडकरी के बयान और लोगों के सवाल लाजमी है...
दरअसल एक टीवी कार्यक्रम के दौरान जब उनसे पूछा गया कि आखिर सांसदों और विधायकों को टोल टैक्स में छूट क्यों दी जाती है, तो उन्होंने सीधे जवाब देने के बजाय व्यवस्था की पुरानी जड़ों की ओर इशारा कर दिया। बार-बार एक ही सवाल दोहराए जाने पर गडकरी के चेहरे पर मुस्कान छा गई और उन्होंने कहा- 'ऐसी सलाह न दें जिससे उनकी कुर्सी खतरे में पड़ जाए।' मंत्री जी का यह बयान भले ही सहज लहजे में दिया गया हो… लेकिन इसके पीछे सच्चाई बड़ी गहरी है। यही कारण है कि अब VIP कल्चर पर एक बार फिर चर्चा में है…जिसका बड़ा हिस्सा एमपी के विधायक और सांसद भी हैं।
दरअसल गडकरी ने साफ किया कि टोल छूट केवल जनप्रतिनिधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि एंबुलेंस जैसे आपातकालीन वाहनों समेत कुछ अन्य श्रेणियों को भी यह सुविधा दी जाती है। साथ ही उन्होंन यह संकेत भी दे दिया कि यह व्यवस्था लंबे समय से लागू है, जिसे तुरंत बदलना आसान बिल्कुल भी नहीं है।
इस बयान के बाद मध्य प्रदेश में भी यह मुद्दा चर्चा में आ गया। प्रदेश के नेशनल हाईवे नेटवर्क पर रोजाना हजारों की संख्या में वाहन आते-जाते हैं। जहां आम नागरिकों को हर बार टोल-टैक्स देना पड़ता है। भोपाल से इंदौर, इंदौर से देवास और जबलपुर जैसे प्रमुख मार्गों पर यात्रा करने वाले लोगों के लिए टोल खर्च अब उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। ऐसे में आम लोगों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि जब सभी नागरिक बराबर हैं, तो फिर जनप्रतिनिधियों को यह विशेष छूट देने का क्या सही है?
ट्रांसपोर्ट सेक्टर से जुड़े लोगों का कहना है कि टोल टैक्स लगातार बढ़ रहा है। इसका सीधा असर उनकी लागत पर पड़ा है। बाद में इसका अशर उपभोक्ताओं पर दिखता है। इसके साथ ही रोजाना ऑफिस या बिजनेस के लिए सफर करने वाले आम लोग इसे अतिरिक्त बोझ मानते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में VIP छूट का मुद्दा और भी संवेदनशील हो जाता है।
हालांकि सरकार का बड़ा तर्क यह भी है कि जनप्रतिनिधियों को अपने क्षेत्र में लगातार दौरा करना पड़ता है। इसलिए उन्हें कुछ सुविधाएं दी जाती हैं, ताकि वे बिना किसी बाधा या रुकावट के अपने दायित्व निभा सकें। लेकिन बदलते समय और बढ़ती जागरुकता के बीच बहस तेज हो रही है कि क्या ऐसी छूटें जरूरी हैं। समानता के सिद्धांत के तहत इन पर पुनर्विचार होना चाहिए।
मध्य प्रदेश में वर्तमान में नेशनल (NHAI) और स्टेट हाईवे समेत करीब 90-110 टोल प्लाजा संचालिक किए जा रहे हैं। इन टोल प्लाजा से हर दिन लाखों वाहन गुजरते हैं और यही नेटवर्क प्रदेश की कनेक्टिविटी को मजबूत बनाते हैं। इनमें भी 64 प्रमुख टोल प्लाजा हैं। जबकि अन्य छोटे राजमार्गों समेत यह संख्या करीब 100 तक पहुंच जाती है। बता दें कि भोपाल, इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर, जैसे बड़े शहरों को जोड़ने वाले प्रमुख हाईवे पर टोल की संख्या और ट्रैफिक दोनों ही ज्यादा हैं।
कई मौकों पर पत्रकारों की ओर से यह मांग उठती रही है कि उन्हें सिर्फ राज्य ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दोनों टोल टैक्स फ्री किए जाएं। लेकिन राज्य ही नहीं नितिन गडकरी इस मुद्दे पर कई बार स्पष्ट कर चुके हैं कि टोल सिस्टम को पूरी तरह से फ्री करना संभव नहीं है। उनका तर्क है कि हाईवे निर्माण और मेंटेनेंस के लिए टोल जरूरी है और सभी को इसमें योगदान देना चाहिए। हालांकि, मौजूदा नियमों के तहत सांसदों और विधायकों कोपहले कुछ छूट मिलती है, लेकिन इसे बढ़ाने को लेकर सरकार सख्त रुख में नजर आती है।
कुल मिलाकर गडकरी का यह बयान केवल एक टिप्पणीभर नहीं था बल्कि इसमें उस संतुलन को भी देखा जा सकता है, जिसमें एक ओर पुरानी व्यवस्थाएं हैं और दूसरी ओर बदलाव की मांग। अब देखना यह होगा कि यह बहस आगे चलकर किसी ठोस नीति या परिवर्तन पर पहुंचती है या सिर्फ एक बयान बनकर, कई दिन चर्चा में रहकर समय रहते भुला दी जाती है।