
bhopal engineering colleges एमपी में स्टूडेंट का इंजीनियरिंग कोर्सेस से मोहभंग हो रहा है। परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। तकनीकी शिक्षा विभाग की इंजीनियरिंग प्रवेश प्रक्रिया में सीएलसी (कॉलेज लेवल काउंसलिंग) का दूसरा राउंड शुरू हो गया है, लेकिन राजधानी भोपाल सहित प्रदेश के कई इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश की स्थिति ठीक नहीं है। भोपाल के ही आधा दर्जन से ज्यादा कॉलेज ऐसे हैं, जहां अब तक एक भी विद्यार्थी ने प्रवेश नहीं लिया है। इन संस्थानों को अब सीएलसी राउंड से ही उम्मीद है।
अधिकारियों के अनुसार सीएलसी के दूसरे राउंड में विद्यार्थी 10 अगस्त तक रजिस्ट्रेशन करा सकेंगे। इसके बाद 11 अगस्त को सुबह 10.30 से शाम 6.30 बजे तक संबंधित कॉलेज पहुंचकर प्रवेश लेना होगा।
विभाग ने इस बार प्रवेश प्रक्रिया में नया नियम लागू किया है। विद्यार्थी को प्रवेश के दौरान सेल्फी लेकर उसे पोर्टल पर अपलोड करना अनिवार्य होगा।
तकनीकी शिक्षा विभाग के अधिकारियों के अनुसार, सेल्फी अपलोड करने की व्यवस्था का उद्देश्य फर्जीवाड़े पर रोक लगाना है। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि जिस विद्यार्थी के नाम पर प्रवेश हो रहा है, वह वास्तव में कॉलेज में मौजूद है और प्रवेश प्रक्रिया में शामिल हुआ है।
द्वितीय काउंसलिंग तक प्रदेश के 135 इंजीनियरिंग संस्थानों में 75 हजार 249 सीटों पर 35 हजार 660 विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया है। इस प्रकार 39 हजार 589 सीटें अभी खाली हैं। भोपाल के ही 6 इंजीनियरिंग कॉलेजों की एक भी सीट नहीं भर सकी है।
आइसकॉम इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी भोपाल
भोपाल इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट भोपाल
कैलाश नारायण पाटीदार कॉलेज, भोपाल
राजीव गांधी प्रौद्योगिकी कॉलेज, भोपाल
श्रीराम कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी, भोपाल
स्वामी विवेकानंद कॉलेज ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, भोपाल
हालात ऐसे हैं एक दशक में प्रदेश के 64 इंजीनियरिंग कॉलेजों में ताला लग चुका है। पिछले साल ही प्रदेश में इंजीनियरिंग की 754 सीटें सरेंडर की गई थीं। यही हाल रहे तो इस साल भी कई इंजीनियरिंग कॉलेजों को सीटें सरेंडर करना होगा।
इंजीनियरिंग में प्लेसमेंट के अवसर लगातार घट रहे हैं और पारंपरिक ब्रांचों में छात्रों की रुचि भी कम होती जा रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ), मशीन लर्निंग (एमएल) और ई-मोबिलिटी जैसी आधुनिक ब्रांचों की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में कॉलेजों पर नए कोर्सेस चालू करने का दबाव बढ़ गया है।
विशेषज्ञों और अधिकारियों के अनुसार छोटे और कम पहचान वाले कॉलेजों के बंद होने का ज्यादा खतरा है। दरअसल छात्र और अभिभावक केवल उन्हीं संस्थानों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जहां बेहतर प्लेसमेंट की गारंटी हो। ऐसे में प्रदेश में कई कॉलेजों के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े हो गए हैं।