
Bhopal news: मेडिकल स्टोर से ली गई दवा की सही खुराक, कितने दिन लेनी है और कैसे लेनी है, इसकी जानकारी मरीज की सेहत के लिए अहम है। लेकिन एमपी के भोपाल शहर में बड़ी संख्या में दवा दुकानों पर यह जिम्मेदारी ऐसे कर्मचारियों के हाथ में होने का दावा किया जा रहा है, जो फार्मासिस्ट नहीं है। मध्यप्रदेश फार्मासिस्ट एसोसिएशन के अनुसार शहर के 60 से 65 प्रतिशत मेडिकल स्टोर किराए के फार्मासिस्ट पंजीयन पर चल रहे है। यानी लाइसेंस में फार्मासिस्ट का नाम है, लेकिन दुकान पर दवा देने वाला कोई और है।
भोपाल में कार्रवाई के दौरान ऐसे मामले सामने आ चुके है। फार्मासिस्ट महेंद्र सिंह इंदौर की दवा कंपनी में कार्यरत थे। उन्होंने सुल्तानिया रोड स्थित मेडिकल स्टोर के लिए अपना पंजीयन दिया था। शिकायत के बाद कार्रवाई करते हुए दुकान का लाइसेंस निलंबित किया गया। इसी तरह फार्मासिस्ट सचिन कुमार एक बड़े मेडिकल स्टोर में काम करते थे। उन्होंने कोलार की दूसरी दवा दुकान के लिए अपना पंजीयन किराए पर दिया। इसके बदले उन्हें 2500 रुपए प्रतिमाह मिलते थे।
जांच में मामला सामने आने पर दुकान का लाइसेंस तीन महीने के लिए निलंबित किया गया। भोपाल में ऐसे सैकड़ों मेडिकल स्टोर है, जो किराए के फर्मासिस्ट लाइसेंस पर चल रहे हैं। फूड एण्ड ड्रग्स एडमनीस्ट्रेशन (एफडीए) के अनुसार भोपाल में पांच हजार पंजीकृत मेडिकल स्टोर है। इनमे से 1500 खुदरा दवा बिक्रेता है। मध्यप्रदेश फर्मासिस्ट एसोसिएशन के अनुसार इनमें से 60 से 65 प्रतिशत मेडिकल स्टोर किराए के फर्मासिस्ट लाइसेंस पर चल रहे हैं, जिन्हें नियम के विरूद्ध दवाओं के आधी अधूरी जानकारी रखने वाले कर्मी चला रहे है। वे मरीजों को दवा की खुराक, दवा खाने की अवधि और सेवन के तौर तरीके बता रहे हैं जिससे मरीजों को खतरा हो सकता है।
एमपीपीए के अनुसार किराए के पंजीयन के लिए फार्मासिस्ट को 2500 से 3000 रुपए महीना दिए जाते हैं। जबकि नियमित फार्मासिस्ट रखने पर करीब 20 से 25 हजार रुपए खर्च होते हैं। संगठन के प्रदेश मीडिया प्रभारी राजवीर त्यागी का कहना है कि कम खर्च में दुकान चलाने की कोशिश में मरीजों की दवा संबंधी सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
एमपीपीए के अनुसार प्रदेश में करीब एक लाख पंजीकृत फार्मासिस्ट हैं, लेकिन करीब 30 हजार ने पंजीयन का नवीनीकरण नहीं कराया है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों, अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों में करीब 11,400 फार्मासिस्ट की कमी बताई गई है। इनमें करीब 10 हजार कमी उप-स्वास्थ्य केंद्रों में है। संगठन का आरोप है कि कई जगह आशा कार्यकर्ता और सीएचओ दवा वितरण कर रहे हैं।
मध्यप्रदेश फार्मेसी काउंसिल के चेयरमैन संजय जैन के अनुसार बिना फार्मासिस्ट मेडिकल स्टोर संचालन रोकने के लिए एफडीए को सर्कुलर भेजा गया है। एफडीए अधिकारियों के अनुसार किराए के पंजीयन पर चलने वाली दुकानों की पहचान और लाइसेंस निलंबन के लिए निरीक्षण जारी रहता है।
ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 और ड्रग्स रूल्स, 1945 के तहत खुदरा दवा दुकान में पंजीकृत फार्मासिस्ट की निर्धारित निगरानी जरूरी है। रूल 65(2) के अनुसार पर्चे वाली दवाओं का वितरण पंजीकृत फार्मासिस्ट की व्यक्तिगत निगरानी में होना चाहिए। केवल कागज पर नाम दर्ज होना पर्याप्त नहीं है। खुदरा लाइसेंस के लिए दवा की श्रेणी के अनुसार फॉर्म-20 और फॉर्म-21 लागू होते हैं।