
भोपाल/ परिवहन विभाग की फ्लाइंग स्क्वॉड ने पिछले महीने जारी किए थे नोटिस वाहन जप्ती की कार्रवाई लंबित होने से धड़ल्ले से चलते रहते हैं खटारा वाहन भोपाल। प्रायवेट स्कूल प्रबंधनों की मनमानी के चलते शहर में यूपी और दिल्ली से खटारा बसों को लाकर स्कूल बस के तौर पर चलाने का धंधा खूब फलफूल रहा है। नियम है कि 15 साल से ज्यादा पुरानी हो चुकी बस को स्कूल बस का परमिट नहीं दिया जाए लेकिन मुनाफाखोरी करने वाले बस ऑपरेटर बगैर परमिट ही इन बसों को शहर के नामी प्रायवेट स्कूलों में अटैच कर हर महीने लाखों रुपए किराया वसूल
ये हैं फिटनेस के पैरामीटर
- ब्रेक लाइट और टर्न लाइट चालू हालत में हो।
- प्रेशर हार्न मोटर व्हीकल एक्ट के अनुसार हो।
- ब्रेक लाइट और टर्न लाइट चालू हो।
- मेक और मॉडल में बदलाव नहीं हो।
- अगले टायर में ग्रिप होना चाहिए। रिमोल्डिंग न हो।
- टूल किट, फस्र्ट बॉक्स व अग्निशामक यंत्र हो।
- बच्चे खिड़की से बाहर सिर न निकालें इसके लिए लोहे की राड या जाली लगी हो।
- गाड़ी के कांच में ही फिटनेस की तारीख, रूट की जानकारी अंकित हो।
- बस जिस स्कूल में चलती हो उसका नाम, फोन नंबर अंकित हो।
- शैक्षणिक संस्थान की बस में सुप्रीमकोर्ट द्वारा तय गाइड लाइन का पालन करना सुनिश्चित हो।
मैजिक एवं आपे में 12 सीट जरूरी
परिवहन विभाग के नियमों के मुताबिक मैजिक एवं आपे में पीला रंग लगाकर स्कूल बस बनाने के मामलों में साफ किया गया है कि इनमें १२ बच्चों के बैठने की जगह होना चाहिए। निर्माता कंपनी की ओर से तैयार डिजाइन के अलावा यदि कोई मॉडीफिकेशन कराया जाता है तो इसे मान्य नहीं किया जा सकेगा। ट्रैवलर एवं बड़ी बसों में १२ से ३२ सीटों का होना अनिवार्य है।
लापरवाही के चलते ये हादसे हुए
- मुरैना में प्रायवेट स्कूल से अटैच अवैध ऑटो का एक्सीडेंट हुआ था जिसमें चालक सहित स्कूली बच्चों की मौत हो गई थी।
- राजधानी भोपाल में भी दो साल पहले बोर्ड ऑफिस चौराहे पर स्कूल बस हादसे में प्रायवेट स्कूल की छात्रा की मौत हो गई थी।
- इंदौर डीपीएस स्कूल की बस एक्सीडेंट में कई बच्चों की मौत हो गई थी।
सूचना और निशानदेही पर अवैध स्कूल वाहन चलाने वालों की धरपकड़ की जा रही है। बच्चों की सुरक्षा भी एक बड़ा मुद्दा है। कई बार अभिभावक ही विरोध करने लगते हैं। प्रायवेट स्कूल प्रबंधनों से भी सहयोग नहीं मिलता।
अलीम खान, परिवहन निरीक्षक, जांच दल