Shri Krishna Janmashtami 2024: मध्यप्रदेश में भी महाभारत कालीन इतिहास से जुड़े कई अनोखे प्रमाण मिलते हैं। यहां विन्ध्यांचल पर्वत श्रृंखला में स्थित जामगढ़ गांव में एक विशाल गुफा है, जहां भगवान श्रीकृष्ण ने अपने ऊपर लगा झूठा कलंक मिटाने 27 दिन युद्ध किया था…जन्माष्टमी 2024 के अवसर पर patrika.com बता रहा है शास्त्रों में उल्लेखित एक रोचक कथा…
Shree Krishna Janmashtami 2024: महाभारत काल (Mahabharata period) में एक समय ऐसा भी आया (history facts) जब भगवान श्रीकृष्ण (Shri Krishna) पर चोरी का आरोप लगा। भगवान पर स्यामंतक मणि की चोरी का झूठा कलंक लगाया गया था। इसे मिटाने के लिए भगवान (Lord Shri Krishna) मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के रायसेन जिले में स्थित विंध्याचल पर्वत श्रृंखला (Vindhyachal Mountain Range) में स्थित जामवंत गुफा (Jamvant Cave) में आए थे और जामवंत के साथ 27 दिन तक युद्ध किया था। यह उल्लेख धार्मिक ग्रंथ प्रेम सागर(religious book prem sagar) में भी मिलता है।
भोपाल से जबलपुर मार्ग (Bhopal to Jabalpur Route) पर बरेली कस्बा (Bareli town) है। यह कस्बा वर्तमान में रायसेन जिले में आता है। यहां से 15 किलोमीटर दूर विंध्यांचल पर्वत श्रृंखला के पहाड़ों में ये गुफाएं हैं। ये गुफाएं कई किलोमीटर दूर तक अंदर ही अंदर फैली हुई हैं। वर्तमान में कुछ लोग यहां जाते हैं, लेकिन भूल-भुलैया जैसी इन गुफाओं के कुछ हिस्सों में ही पहुंच पाते हैं और फिर लौट आते हैं।
सत्राजीत ने भगवान सूर्य की उपासना की थी। इसके बाद उन्हें भगवान ने स्यामंतक मणि दी थी। यह मणि सूर्य के समान चमकदार थी। इसकी रोशनी दूर-दूर तक जाती थी। उस समय भगवान कृष्ण चौसर खेल रहे थे, तभी सत्राजीत वो मणि लेकर आया।
इस दौरान सूर्य के समान चमकने वाले सत्राजीत को देखकर श्रीकृष्ण के साथ मौजूद यादवनों ने कहा था कि अरे सत्राजीत, तुम्हारे पास अलौकिक दिव्य मणि है। वो तो किसी राजा के पास ही होना चाहिए था। इस पर वे तत्काल वहां से चले गए।
इसके बाद सत्राजीत ने मणि को घर के मंदिर में रख दिया था। एक दिन सत्राजीत का भाई प्रसेनजीत उस मणि को पहनकर घोड़े पर सवार हुआ और शिकार के लिए निकल पड़ा। घने जंगल में प्रसेनजीत और उसके घोड़े को एक सिंह ने मार डाला और उसकी मणि उससे छीन ली।
उस सिंह को ऋक्षराज जामवंत ने मार डाला। अब जामवंत ने वह मणि हासिल कर ली। अपनी गुफा में पहुंचकर जामवंत ने वो मणि अपने बालक को खेलने के लिए दे दी। जब प्रसेनजीत वापस नहीं आए तो सत्राजीत समझे कि उनके भाई को श्रीकृष्ण ने मार डाला और स्यामंतक मणि छीन ली। उन्होंने चोरी का यह संदेह पूरी द्वारिका में फैला दिया। जब यह खबर श्रीकृष्ण तक पहुंची तो वह व्यथित हो गए और चोरी का ये कलंक मिटाने वे मणि की खोज में निकल पड़े।
भगवान श्रीकृष्ण रीछ के पैरों के निशान देखते हुए एक गुफा तक पहुंच गए। ये जामवंत की गुफा थी। वहां उन्होंने देखा कि रीछ का एक बालक चमकती-दमकती मणि के साथ खेल रहा था। श्रीकृष्ण ने मणि से खेलते बालक के पास से मणि उठा ली। भगवान श्रीकृष्ण को मणि उठाता देख, जामवंत क्रोधित हो गए और श्रीकृष्ण के साथ युद्ध करने लगे।
माना जाता है कि यह युद्ध 27 दिन तक लगातार चलता रहा। युद्ध में जब जामवंत हार गए तो पता चला कि यह तो प्रभु श्रीकृष्ण हैं और श्रीराम के ही अवतार हैं, तब युद्ध रुक गया था। जामवंत ने अपनी हार स्वीकार कर ली। इसके बाद अपनी पुत्री जामवंती का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया। इसी विवाह में जामवंत ने यह मणि श्रीकृष्ण को सौंप दी थी।
इस तरह भगवान श्री कृष्ण ने अपने ऊपर लगा कलंक मिटा दिया और जामवंत को इस युग में भी भगवान के दर्शन हो गए थे। श्रीकृष्ण द्वारका लौटे तब राजा सत्राजीत को वो मणि लौटा दी। इसके बाद उन्हें काफी पश्चाताप हुआ।