बीजापुर

कभी डर के साए में थे सपने, अब चीन-जापान तक लहरा रहे तिरंगा, बीजापुर के खिलाड़ियों की कहानी

Bastar Sports Talent: बीजापुर के नक्सल प्रभावित इलाकों से निकले खिलाड़ियों ने संघर्ष और डर को पीछे छोड़ राष्ट्रीय से अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहचान बनाई है। चीन-जापान तक भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व कर इन खिलाड़ियों ने नई मिसाल कायम की।
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Aug 29, 2026
Bijapur Sports Players
Bijapur Sports Players: बीजापुर से चीन तक पहुंची रेणुका(photo-patrika)

Bijapur Sports Players: कभी बीजापुर के अंदरूनी इलाकों में बच्चों के सपनों के सामने डर और चुनौतियां खड़ी रहती थीं। गांव से बाहर निकलना आसान नहीं था। खेल के लिए बच्चों को हॉस्टल भेजना परिवारों के लिए जोखिम भरा फैसला माना जाता था। कई परिवारों को धमकियों का सामना भी करना पड़ता था। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। धनोरा, आवापल्ली और पिंडुमपाल जैसे अंदरूनी इलाकों से निकले खिलाड़ी राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

किसी ने नेशनल प्रतियोगिताओं में पदक जीते तो किसी ने चीन और जापान तक पहुंचकर भारतीय टीम की जर्सी पहनी। राज्य खेल अलंकरण समारोह में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय इन खिलाड़ियों को सम्मानित करेंगे। यह सम्मान उनकी खेल उपलब्धियों के साथ-साथ उन संघर्षों को भी सलाम है, जिन्हें पार कर उन्होंने यह मुकाम हासिल किया।

Chhattisgarh Sports News: बीजापुर से चीन तक पहुंची रेणुका

बीजापुर की रेणुका तेल्लम ने वर्ष 2017 में स्पोर्ट्स एकेडमी से अपने खेल सफर की शुरुआत की। धीरे-धीरे खेल उनकी जिंदगी का अहम हिस्सा बन गया। लगातार मेहनत और बेहतर प्रदर्शन के दम पर उन्होंने 14 नेशनल गेम्स में हिस्सा लिया और तीन कांस्य तथा दो रजत पदक जीते। रेणुका चीन में भी भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं।

Chhattisgarh Sports News: बीजापुर से चीन तक पहुंची रेणुका

नक्सल प्रभावित इलाके के एक गांव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचना उनके लिए व्यक्तिगत उपलब्धि से कहीं ज्यादा है। यह उन बच्चों के लिए उम्मीद की किरण है, जिनके सपने कभी डर और परिस्थितियों के बीच दब जाते थे। अब रेणुका का लक्ष्य और बड़ा है। वह चाहती हैं कि सॉफ्टबॉल को ओलंपिक खेल का दर्जा मिले और उन्हें भारत की ओर से ओलंपिक में खेलने के साथ देश के लिए स्वर्ण पदक जीतने का मौका मिले।

धमकियों के बावजूद नहीं रुकी विमला

बीजापुर के ग्राम धनोरा की विमला तेल्लम के सामने भी रास्ते आसान नहीं थे। खेल में आगे बढ़ने के लिए उन्हें हॉस्टल में रहना पड़ा। उस समय इलाके में नक्सलवाद का प्रभाव काफी अधिक था। परिवार को धमकियां मिलती थीं कि बच्चों को खेल के लिए बाहर क्यों भेजा जा रहा है। इसके बावजूद परिवार ने हिम्मत नहीं छोड़ी और विमला ने भी खेल जारी रखा।

मेहनत और लगन के दम पर उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। जिस दौर में एक बच्ची का गांव से बाहर निकलना भी चुनौती माना जाता था, उसी दौर में विमला ने देश का प्रतिनिधित्व करने का सपना पूरा किया।

समाज की बातों को पीछे छोड़ आगे बढ़ीं चंद्रकला

आवापल्ली की चंद्रकला के सामने खेल के साथ सामाजिक सोच भी बड़ी चुनौती थी। जब वह खेलने के लिए गांव से बाहर जाती थीं, तो परिवार से सवाल किया जाता था कि लड़की को बाहर क्यों भेजा जा रहा है। कुछ लोगों ने तो यहां तक कहा कि लड़की को खेल के लिए बाहर भेजने से परिवार की बदनामी होगी। लेकिन चंद्रकला ने इन बातों को अपनी मंजिल के बीच नहीं आने दिया। 'उन्होंने खेल को चुना और आज यही फैसला उनकी पहचान बन चुका है। अब उनकी नजर 2028 ओलंपिक पर है। वह इसकी तैयारी में जुटी हैं और देश के लिए पदक जीतना उनका अगला लक्ष्य है।

पहली उड़ान से जापान तक पहुंचे सुशील

बीजापुर के अंदरूनी इलाके पिंडुमपाल, भैरमगढ़ के सुशील कुड़ियम की कहानी बताती है कि प्रतिभा को सही मंच मिल जाए तो गांव की सीमाएं भी छोटी पड़ जाती हैं। आठवीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान स्कूल की खेल गतिविधि में एक शिक्षक ने सुशील की प्रतिभा पहचानी। शिक्षक ने उन्हें स्पोर्ट्स एकेडमी जाने की सलाह दी। चयन के बाद उन्हें स्पोर्ट्स एकेडमी के हॉस्टल में जगह मिली।

इसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन करते हुए उनका चयन इंडिया ट्रायल और कैंप के लिए हुआ। फिर वह मौका आया, जब सुशील भारतीय टीम के साथ जापान पहुंचे। पहली बार विमान में बैठना, पहली बार विदेश जाना और जापान पहुंचते ही भारतीय टीम की बस देखना उनके लिए किसी सपने के सच होने जैसा था। एक छोटे से गांव से जापान तक का यह सफर बताता है कि सही प्रशिक्षण और अवसर मिलने पर प्रतिभा के सामने कोई भौगोलिक सीमा बड़ी नहीं होती।

चार साल की उम्र में बाल गृह पहुंचे राकेश

आवापल्ली के राकेश कड़ती की कहानी संघर्ष की सबसे भावुक मिसालों में से एक है। बचपन में नक्सल हिंसा में उनके पिता की हत्या हो गई। इसके बाद मां का भी निधन हो गया। महज चार साल की उम्र में राकेश को बाल गृह भेज दिया गया। इन त्रासदियों के बावजूद उन्होंने पढ़ाई के साथ खेल को अपना सहारा बनाया। बाल गृह में रहते हुए उनकी खेल प्रतिभा निखरी।

राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीतने के बाद उन्होंने भारतीय टीम में जगह बनाई। राकेश जापान में अंडर-18 एशिया कप और बैंकॉक में अंडर-23 एशिया कप में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। उनकी उपलब्धियों ने बीजापुर ही नहीं, बल्कि पूरे बस्तर के लिए नई मिसाल कायम की है।

खेल को मानते हैं आगे बढ़ने का रास्ता

राकेश का मानना है कि जिन बच्चों ने अपने परिवार खोए हैं, उनके लिए खेल आगे बढ़ने का रास्ता बन सकता है। उनका सपना है कि बीजापुर के और भी बच्चे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचें और देश का नाम रोशन करें। उनकी अपनी कहानी इस बात का उदाहरण है कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद अगर बच्चे को सही अवसर, प्रशिक्षण और मार्गदर्शन मिले तो वह जिंदगी की दिशा बदल सकता है।

नक्सल प्रभावित गांवों से निकल रही उम्मीद की नई तस्वीर

बीजापुर के इन खिलाड़ियों की उपलब्धियां केवल व्यक्तिगत सफलता की कहानियां नहीं हैं। ये नक्सल प्रभावित इलाकों में बदलती तस्वीर का संकेत भी हैं।धनोरा, आवापल्ली और पिंडुमपाल जैसे गांवों से निकलकर इन खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच बनाई है। कभी जिन इलाकों की पहचान हिंसा और डर से होती थी, वहां अब खेल प्रतिभाएं नई उम्मीद पैदा कर रही हैं।

इन खिलाड़ियों की यात्रा यह साबित करती है कि हालात कितने भी कठिन हों, प्रतिभा को अवसर और सही प्रशिक्षण मिल जाए तो वह अपनी पहचान बनाने का रास्ता जरूर खोज लेती है।

Updated on:
29 Aug 2026 01:49 pm
Published on:
29 Aug 2026 01:48 pm