बीकानेर

बीकानेर रियासत में तब ‘पानी की खबर’बन जाती थी सबसे बड़ी खुशखबरी, तालाब भरने की सूचना लाने वाले को मिलता था इनाम

आज के दौर में पानी भले ही नलों, टंकियों और पाइपलाइन तक सीमित एक सामान्य सुविधा जैसा लगता हो, लेकिन मरुस्थलीय बीकानेर रियासत में कभी पानी का आना जीवन, राहत और समृद्धि का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता था।

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May 27, 2026
बीकानेर रियासत में ‘पानी की खबर’ थी सबसे बड़ी खुशखबरी, तालाब भरने की सूचना लाने वाले को मिलता था नकद इनाम। फोटो पत्रिका नेटवर्क

बीकानेर। आज के दौर में पानी भले ही नलों, टंकियों और पाइपलाइन तक सीमित एक सामान्य सुविधा जैसा लगता हो, लेकिन मरुस्थलीय बीकानेर रियासत में कभी पानी का आना जीवन, राहत और समृद्धि का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता था। वर्षा के बाद तालाब, तलाई या जोहड़ के भरने की खबर केवल सूचना नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए खुशहाली का संदेश होती थी। यही कारण था कि ऐसी शुभ सूचना लेकर दरबार पहुंचने वाले व्यक्ति को राजकीय सम्मान के साथ नकद पुरस्कार दिया जाता था।

मोडी लिपि में लिखित बीकानेर रियासतकालीन दुर्लभ दस्तावेज इस अनूठी परंपरा की गवाही देते हैं। इन अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि तत्कालीन समाज और शासन दोनों ही जल के महत्व को लेकर कितने संवेदनशील और जागरूक थे।

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दो रुपए का इनाम था बड़ा सम्मान

ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार वर्ष 1876 में महाराजा डूंगरसिंह के शासनकाल में एक व्यक्ति ने वर्षा के बाद जोहड़ की तलाई पूरी भर जाने की सूचना दरबार तक पहुंचाई। इस शुभ समाचार से प्रसन्न होकर दरबार ने उसे तत्काल दो रुपए का नकद पुरस्कार देने का आदेश दिया। यह राशि जोहड़ के हवलदार के माध्यम से सूचना देने वाले तक पहुंचाई गई। उस दौर में दो रुपए सामान्य राशि नहीं मानी जाती थी। यह केवल आर्थिक पुरस्कार नहीं, बल्कि जल के महत्व और सूचना लाने वाले व्यक्ति के प्रति सार्वजनिक सम्मान का प्रतीक था।

150 साल पुरानी बही में दर्ज है परंपरा

इतिहासकार डॉ. नितिन गोयल के अनुसार करीब 150 वर्ष पहले बीकानेर राज्य में वर्षा केवल मौसम परिवर्तन नहीं, बल्कि उम्मीद और जीवन का प्रतीक मानी जाती थी। बीकानेर दरबार की ‘काउंसिल हुकुम बही’ में उल्लेख मिलता है कि जब किसी तालाब या तलाई के पूरी तरह भरने की सूचना दरबार तक पहुंचती थी, तब सूचना देने वाले व्यक्ति को पुरस्कार देकर सम्मानित किया जाता था।

जल संरक्षण था सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव

डॉ. गोयल के अनुसार तत्कालीन बीकानेर में जल संरक्षण केवल प्रशासनिक व्यवस्था तक सीमित नहीं था। पानी लोकजीवन, संस्कृति और सामाजिक चेतना का अभिन्न हिस्सा था। तालाबों का भरना खुशहाली, राहत और आने वाले अच्छे समय का संकेत माना जाता था। मरुस्थलीय क्षेत्र होने के कारण बीकानेर में पानी को जीवन का आधार माना गया और जल स्रोतों की रक्षा सामूहिक जिम्मेदारी समझी जाती थी। यही वजह थी कि तालाबों और जोहड़ों से जुड़ी खबरें सामाजिक उत्सव का रूप ले लेती थीं।

आज भी प्रासंगिक है रियासतकाल की सोच

इतिहास के ये दस्तावेज आज के दौर में भी महत्वपूर्ण संदेश देते हैं। जब पूरी दुनिया जल संकट और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, तब बीकानेर रियासत की यह परंपरा बताती है कि जल संरक्षण केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि सामाजिक संस्कार होना चाहिए।

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Published on:
27 May 2026 02:57 pm
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