बीकानेर

राजस्थान_का_रण: भले ही हार जाएं, गाजे-बाजे संग ‘बंदौळी’ निकाल जीतते थे दिल

बीकानेर के विधानसभा चुनाव अपने आप में रोचक रहे हैं। यहां अधिकतर निर्दलीय प्रत्याशी भले ही अपनी जीत दर्ज नहीं करवा पाए हों, लेकिन यहां होने वाली बंदौळी से उन्होंने जनता का दिल जरूर जीता है।
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Updated: 15 Oct 2018, 8:17 AM IST
rajasthan ka ran
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विमल छंगाणी/बीकानेर. बीकानेर के विधानसभा चुनाव अपने आप में रोचक रहे हैं। यहां अधिकतर निर्दलीय प्रत्याशी भले ही अपनी जीत दर्ज नहीं करवा पाए हों, लेकिन यहां होने वाली बंदौळी से उन्होंने जनता का दिल जरूर जीता है। यही नहीं, बीकानेर के चुनाव गीत, दोहे, कविताओं और पहनावे के साथ विशिष्ट चुनावी प्रचार के कारण भी सुर्खियों में रहे हैं।

पचास और साठ के दशक में चुनावी प्रचार के दौरान निर्दलीय प्रत्याशियों के समर्थकों की ओर से निकाली जाने वाली 'बंदौळीÓ को लोग सालों बाद भी याद करते हैं। शहर के वरिष्ठ नागरिक नटवर लाल व्यास बताते है कि 'बंदौळी' वैसे तो शादी-विवाह की एक रस्म है, लेकिन चुनावी माहौल में निर्दलीय प्रत्याशियों के समर्थक एक छोटे जुलूस के रूप में अपने प्रत्याशी को साथ लेकर शहर में गाजे-बाजे के साथ बंदौळी निकालते थे। बंदौळी के दौरान शहर की गली-मोहल्लों का पूरा माहौल खुशनुमा बन जाता था। प्रत्याशी अपने विशेष हाव-भाव, अपने से छोटों के भी पांव छूकर आशीर्वाद लेते और समर्थन की अपील करते। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक बंदौळी का आनन्द लेते।


उमड़ते थे लोग
साठ के दशक में चुनावी बंदौळी का विशेष उत्साह था। रूपनारायण पुरोहित बताते हैं कि बंदौळी देखने के लिए सड़कों पर हजारों लोगों की भीड़ रहती थी। प्रत्याशी घोड़े पर सवार होकर, कभी वाहन तो कभी पैदल ही बंदौळी में शामिल होते थे। प्रत्याशी के आगे-आगे उनके समर्थक ढोल-नगाड़ों, के साथ नाचते-गाते और में नारेबाजी करते शामिल होते थे। पूरा माहौल हंसी-मजाक से लबरेज हो जाता था।

माहौल को बनाते थे खुशनुमा: निर्दलीय प्रत्याशियों को भले ही विधानसभा चुनावों के दौरान सफलता अधिक नहीं मिल पाई हो, लेकिन उन्होंने पचास और साठ के दशक में चुनावी तनाव के माहौल को खुशनुमा बनाने में अहम भूमिका निभाई। नटवर लाल व्यास बताते है कि बंदौळी के दौरान हर चेहरे पर मुस्कान दिखाई देती थी। उस दौर में भंवरलाल सुराणा की ओर से निकाली जाने वाली बंदौळी को लोग आज भी नहीं भूल पाए हैं। अस्सी के दशक के बाद इसका चलन कम हो गया। पार्षद चुनावों के दौरान भी प्रत्याशियों की बंदौळी निकाली जाती थी।

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