कर्मचारियों की मांगों को अनसुनी करने पर आगामी 27 जून को प्रदेश के अधिकारी-कर्मचारी फेडरेशन के आव्हान पर एक दिन का सामूहिक अवकाश आंदोलन करेंगे
बिलासपुर . प्रदेश में लिपिक कर्मचारियों का वेतन सरकारी विभागों में काम करने वाले चपरासियों से भी कम हो गई है। दूसरी तरफ लिपिक कर्मचारियों पर सबसे अधिक जिम्मेदारी रहती है। दफ्तरों की सभी महत्वपूर्ण फाइलें लिपिक कर्मचारियों को संभालनी पड़ती है। सरकारी कार्यालयों में बाबूराज नहीं है बल्कि अफसरों के इशारों पर काम होता है,फाइलें आगे बढ़ती है। लेकिन बदनामी का ठीकरा लिपिकों पर फोड़ा जाता है। उक्त बातें छत्तीसगढ़ प्रदेश लिपिक वर्गीय शासकीय कर्मचारी संघ के प्रदेश महामंत्री रोहित तिवारी ने मंगलवार को 'पत्रिका टॉपिक ऑफ द डे Ó में कहीं। तिवारी ने कहा कि सन् 1981 से पहले शासकीय विभागों में लिपिकों के वेतन सर्वाधिक हुआ करता था। आज की स्थिति में लिपिक कर्मचारियों का वेतनमान चपरासियों से भी कम हो गया है। जबकि लिपिक कर्मचारियों पर सरकारी कार्यालयों में सर्वाधिक काम का बोझ बढ़ गया है। छग प्रदेश लिपिक वर्गीय शासकीय कर्मचारी संघ के प्रदेश महामंत्री ने कहा कि रेलवे एवं बीएसएनएल के समान राज्य में कर्मचारी संगठनों को मान्यता देने का नियम बनाया जाए। ताकि राज्य में कर्मचारी संगठनों की बाढ़ को रोका जा सके। अविभाजित मप्र में केवल चार कर्मचारी संघों को मान्यता मिलीं थी। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद 16 कर्मचारी संघों को मान्यता दी गई। वर्तमान में प्रदेश में 28 कर्मचारी संगठनों को राज्य सरकार मान्यता दे रखीं है। इनमें अनेक कर्मचारी संगठनों का राजधानी छोड़कर किसी भी जिले में अस्तित्व में नहीं है। ऐसे संगठनों के चलते कर्मचारी संघों का आंदोलन कमजोर हुआ है।
चपरासियों से कम हो गया लिपिकों का वेतन 26 मई को : प्रदेश के संभागीय मुख्यालयों पर प्रदर्शनलिपिक कर्मचारियों ने वेतन विसंगतियों को दूर करने की मांग को लेकर 26 मई को संभागीय मुख्यालयों में प्रदर्शन करेगा। इसके बाद भी राज्य सरकार ने कर्मचारियों की मांगों को अनसुनी करने पर आगामी 27 जून को प्रदेश के अधिकारी-कर्मचारी फेडरेशन के आव्हान पर एक दिन का सामूहिक अवकाश आंदोलन करेंगे। तिवारी ने कहा कि सरकारी कार्यालयों में लिपिकों पर फाइलें दबाने की आमजनों में धारण बन गई है जबकि वास्तव में ऐसा नहीं है। अफसरों के इशारों पर लिपिक कर्मचारी कार्य करते है। अधिकारी ही लिपिकों को कहकर फाइलें को दबाते है और बदनामी बेवजह लिपिकों को झेलनी पड़ती है। अधिकारियों को जिन फाइलों में रूचि रहती है वह कार्य जल्दी होता है और जिनमें अरूचि रहती है वह महीनों आलमारियों में धूल खाते पड़ी रहती है।