
Bilaspur Diwali Market: इस त्योहारी कारोबार के बीच पटाखों की कीमतों को लेकर एक ऐसा खेल चल रहा है, जिसमें ग्राहकों को फायदा होने के बजाय नुकसान उठाना पड़ रहा है। बाजार में कई पटाखा उत्पादों पर वास्तविक बाजार कीमत से 10 गुना तक अधिक अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) अंकित होने की शिकायतें सामने आ रही हैं। दुकानदार इसी बढ़ी हुई एमआरपी को आधार बनाकर ग्राहकों को 10 से 50 प्रतिशत तक छूट देने का दावा करते हैं। ग्राहक भारी डिस्काउंट देखकर इसे फायदे का सौदा समझ लेते हैं, जबकि हकीकत में उन्हें वास्तविक कीमत का अंदाजा ही नहीं लग पाता।
अधिकतम खुदरा मूल्य यानी एमआरपी अंकित करने की व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं को कीमतों में पारदर्शिता देना और खुदरा विक्रेताओं को मनमाने दाम वसूलने से रोकना है। किसी भी पैक उत्पाद पर एमआरपी अंकित होने से ग्राहक को यह जानकारी मिलती है कि उस वस्तु को अधिकतम कितनी कीमत पर बेचा जा सकता है। लेकिन पटाखा बाजार में इसी व्यवस्था का अलग तरीके से इस्तेमाल किए जाने की शिकायतें हैं। पटाखा उत्पादों पर उनकी वास्तविक बिक्री कीमत की तुलना में कई गुना अधिक एमआरपी छापी जाती है।
इसके बाद दुकानदार इसी एमआरपी को आधार बनाकर ग्राहकों को भारी छूट का ऑफर देते हैं। मसलन, जिस उत्पाद की वास्तविक बाजार कीमत 100 रुपए के आसपास है, उस पर 1000 रुपए तक एमआरपी अंकित होने की स्थिति में दुकानदार 50 प्रतिशत छूट देकर उसे 500 रुपए में बेचने का दावा कर सकता है। ग्राहक को लगता है कि उसे आधी कीमत में सामान मिल रहा है, जबकि वास्तविक कीमत के मुकाबले वह कहीं अधिक भुगतान कर सकता है।
दीपावली के दौरान पटाखों की खरीदारी में ग्राहक अक्सर अलग-अलग दुकानों पर कीमतों की तुलना करने के बजाय दुकानदारों के छूट संबंधी दावों पर भरोसा कर लेते हैं। कई बार आकर्षक ऑफर और भारी डिस्काउंट खरीदारी का निर्णय प्रभावित करते हैं। पटाखों के पैकेट पर छपी एमआरपी को ही वास्तविक कीमत मानकर ग्राहक दुकानदार से मोलभाव भी करते हैं। यही वजह है कि एमआरपी और वास्तविक बाजार मूल्य के बीच अंतर का फायदा उठाने की आशंका बनी रहती है। ग्राहकों के सामने सबसे बड़ी परेशानी यह है कि उन्हें यह पता लगाने का कोई आसान तरीका नहीं मिलता कि किसी पटाखा उत्पाद की उचित कीमत कितनी होनी चाहिए। अलग-अलग दुकानों पर एक जैसे उत्पादों की कीमतों में अंतर भी इस परेशानी को बढ़ाता है।