IAS IPS contempt case: छत्तीसगढ़ में हाईकोर्ट के आदेशों की अनदेखी और अफसरों की मनमानी को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। कोर्ट से राहत मिलने के बावजूद कई मामलों में आदेशों का पालन नहीं हो रहा, जिसके चलते लोगों को दोबारा अवमानना याचिकाएं दायर करनी पड़ रही हैं।
Chhattisgarh High Court:राजीव द्विवेदी. छत्तीसगढ़ में हाईकोर्ट के आदेशों की अनदेखी और प्रशासनिक अधिकारियों की मनमानी लगातार गंभीर मुद्दा बनती जा रही है। स्थिति यह है कि अदालत से राहत मिलने के बाद भी पीड़ितों को न्याय का वास्तविक लाभ नहीं मिल पा रहा है। आदेशों का पालन कराने के लिए लोगों को दोबारा कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है और अवमानना याचिकाएं दायर करनी पड़ रही हैं। पिछले 12 वर्षों के आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि राज्य में अदालती आदेशों की अवहेलना लगातार बढ़ती जा रही है। इस दायरे में अब केवल छोटे अधिकारी ही नहीं बल्कि आईएएस, आईपीएस, विश्वविद्यालयों के कुलपति, निगमों के सीएमडी और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी भी आ चुके हैं।
हाईकोर्ट में लंबित अवमानना मामलों के आंकड़े स्थिति की गंभीरता को साफ दर्शाते हैं। दिसंबर 2015 में जहां ऐसे मामलों की संख्या केवल 391 थी, वहीं दिसंबर 2022 तक यह बढ़कर 2324 पहुंच गई। यानी महज आठ वर्षों में मामलों में लगभग छह गुना वृद्धि दर्ज की गई। हालांकि 2023 और 2024 में मामलों में कुछ कमी देखी गई, लेकिन 2025 और 2026 में फिर तेजी आने लगी। अप्रैल 2026 तक हाईकोर्ट में 1945 अवमानना प्रकरण लंबित बताए गए हैं।
इन आंकड़ों ने न्याय व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कई मामलों में हाईकोर्ट से स्पष्ट आदेश मिलने के बावजूद विभागीय अधिकारी उनका पालन नहीं कर रहे हैं। इसके कारण प्रभावित लोगों को पुनः अवमानना याचिका दायर करनी पड़ रही है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति न्यायिक प्रक्रिया की प्रभावशीलता पर असर डाल रही है। यदि कोर्ट के आदेशों का पालन समय पर न हो, तो आम नागरिक का न्यायपालिका पर भरोसा कमजोर हो सकता है।
अवमानना मामलों में सख्त कार्रवाई और स्पष्ट गाइडलाइन की मांग को लेकर वर्ष 2020 में हाईकोर्ट में एक याचिका भी दायर की गई थी। अधिवक्ता संतोष पांडेय ने याचिका में आरोप लगाया था कि प्रदेश के अधिकारी हाईकोर्ट के आदेशों की खुलेआम अनदेखी कर रहे हैं। याचिका में यह भी कहा गया था कि हालात ऐसे बन गए हैं कि राज्य के मुख्य सचिव और डीजीपी तक को अदालत में तलब किया जा चुका है। हालांकि कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि आदेशों का पालन न होने पर कानून के तहत अन्य वैधानिक उपाय उपलब्ध हैं।
हाल के वर्षों में कई मामलों में हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। 7 मई 2025 की सुनवाई में कोर्ट ने शिक्षकों की नियुक्ति मामले में पूछा कि रोक के बावजूद जॉइनिंग क्यों कराई गई। इसी तरह जल संसाधन विभाग में नियम विरुद्ध पदस्थापना के मामले में चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की बेंच ने एफआईआर दर्ज कराने तक की चेतावनी दी थी।
राजस्व रिकॉर्ड सुरक्षित नहीं रखने के मामले में भी तत्कालीन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए गए। वहीं सड़क पर आवारा मवेशियों से होने वाले हादसों को रोकने के आदेश का पालन न होने पर तत्कालीन मुख्य सचिव के खिलाफ अवमानना याचिका दायर की गई थी।
अदालती आदेशों की अनदेखी पर Contempt of Court Act 1971 के तहत कार्रवाई की जाती है। अधिकारियों द्वारा कोर्ट के आदेश न मानना सिविल अवमानना की श्रेणी में आता है।
हालांकि अदालत बिना शर्त लिखित माफी स्वीकार कर राहत भी दे सकती है।
हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष रजनीश सिंह बघेल ने कहा कि न्यायपालिका को अदालत की अवहेलना करने वाले अधिकारियों के खिलाफ सीधे सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। उनका कहना है कि जब शीर्ष स्तर के अधिकारी सजा पाएंगे, तभी निचले स्तर तक सुधार पहुंचेगा। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि अवमानना को अधिकारियों के सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज किया जाना चाहिए और अदालतों में होने वाला खर्च दोषी अधिकारियों से वसूला जाना चाहिए।
विशेषज्ञ मानते हैं कि लगातार बढ़ते अवमानना मामले केवल कानूनी मुद्दा नहीं बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का भी गंभीर विषय हैं। यदि अधिकारी न्यायालय के आदेशों को गंभीरता से नहीं लेते, तो इससे शासन व्यवस्था और कानून के प्रति सम्मान दोनों प्रभावित होते हैं। न्यायपालिका की सख्ती के बावजूद यदि हालात नहीं बदलते, तो आने वाले समय में कोर्ट और सरकार के बीच टकराव की स्थिति भी बन सकती है।
कानूनी जानकारों का कहना है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अदालत के आदेश सर्वोपरि होते हैं। यदि आदेशों का पालन नहीं होगा तो आम नागरिक का न्याय व्यवस्था से भरोसा कमजोर पड़ेगा। इसी वजह से अब अदालतों द्वारा प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय करने और अवमानना मामलों में सख्ती बढ़ाने की मांग तेज होती जा रही है।