बिलासपुर

प्रतिनियुक्ति खत्म कर मूल पद पर भेजने का आदेश बरकरार, बिलासपुर हाईकोर्ट से महिला प्राचार्य को झटका

Principal Petition Dismissed: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने प्रतिनियुक्ति समाप्त कर मूल पद पर भेजने के शासन के आदेश को चुनौती देने वाली महिला प्राचार्य प्रीति तिवारी की याचिका खारिज कर दी।
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Chhattisgarh High Court
प्रतिनियुक्ति को लेकर हाईकोर्ट का अहम फैसला (Photo Source- Patrika File Photo)

Chhattisgarh High Court: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने प्रतिनियुक्ति समाप्त कर मूल पदस्थापना पर वापस भेजने के राज्य शासन के आदेश को चुनौती देने वाली महिला प्राचार्य की याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस बीडी गुरु की सिंगल बेंच ने स्पष्ट किया कि प्रतिनियुक्ति एक अस्थायी प्रशासनिक व्यवस्था है। किसी कर्मचारी को प्रतिनियुक्ति पर भेजे गए संस्थान या विभाग में स्थायी रूप से बने रहने का कानूनी अधिकार नहीं है। कोर्ट ने राज्य शासन के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए याचिकाकर्ता प्रीति तिवारी को राहत नहीं दी।

Deputation Transfer Case: प्रतिनियुक्ति समाप्त कर मूल पद पर भेजने का आदेश

बिलासपुर के नेहरू नगर निवासी प्रीति तिवारी मूल रूप से ई-संवर्ग की प्राचार्य हैं। वह उन्नत शैक्षिक अध्ययन संस्थान, बिलासपुर में सहायक प्राध्यापक के पद पर प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत थीं। राज्य शासन ने 10 जुलाई 2026 को आदेश जारी कर उनकी प्रतिनियुक्ति समाप्त कर दी थी। शासन के आदेश के तहत उन्हें शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, बाल्दाकछार, विकासखंड कसडोल, जिला बलौदाबाजार-भाटापारा में मूल पदस्थापना पर वापस भेजने का निर्देश दिया गया। इस निर्णय से असंतुष्ट प्रीति तिवारी ने पहले राज्य शासन के समक्ष शिकायत प्रस्तुत की। हालांकि, वहां से भी उन्हें राहत नहीं मिली।

शिकायत निवारण समिति ने भी खारिज की आपत्ति

प्रतिनियुक्ति समाप्त करने के आदेश के खिलाफ प्रीति तिवारी ने वरिष्ठ सचिवों की स्थानांतरण शिकायत निवारण समिति के समक्ष अपनी आपत्तियां रखीं। समिति ने मामले पर विचार करने के बाद 19 अगस्त 2026 को उनकी शिकायत खारिज कर दी। इसके बाद उन्होंने राज्य शासन के आदेश और शिकायत निवारण समिति के निर्णय को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की। याचिकाकर्ता ने मांग की कि प्रतिनियुक्ति समाप्त करने के आदेश को निरस्त किया जाए और उनकी व्यक्तिगत परिस्थितियों तथा उठाई गई आपत्तियों पर उचित विचार किया जाए।

तत्कालीन प्राचार्य के पत्र को लेकर उठाए सवाल

हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उनके और संस्थान के कुछ अन्य कर्मचारियों के खिलाफ शिकायत के बाद सामूहिक कार्रवाई की गई थी। उन्होंने सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त दस्तावेजों का हवाला देते हुए प्रतिनियुक्ति समाप्त करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। याचिका के अनुसार, कार्रवाई तत्कालीन प्राचार्य के नाम से भेजे गए एक पत्र पर आधारित थी। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि तत्कालीन प्राचार्य ने संबंधित पत्र तैयार करने, उस पर हस्ताक्षर करने और उसे भेजने से इनकार किया था। साथ ही, उन्होंने हस्ताक्षर और संस्थान की मुहर के कथित दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए सिटी कोतवाली थाने में एफआईआर भी दर्ज कराई थी।

स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का भी दिया हवाला

प्रीति तिवारी ने कोर्ट के सामने अपनी स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का भी उल्लेख किया। उनकी ओर से दलील दी गई कि प्रतिनियुक्ति समाप्त करने से पहले उनकी चिकित्सकीय परिस्थितियों पर उचित विचार नहीं किया गया। याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि शिकायत निवारण समिति ने उनकी आपत्तियों और व्यक्तिगत परिस्थितियों का समुचित परीक्षण नहीं किया। इन आधारों पर उन्होंने शासन के आदेश को निरस्त करने की मांग की।

शासन ने कहा- यह सामान्य स्थानांतरण का मामला नहीं

राज्य शासन की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि यह सामान्य स्थानांतरण का मामला नहीं है। यह प्रतिनियुक्ति समाप्त कर कर्मचारी को उसके मूल विभाग और पदस्थापना पर वापस भेजने की प्रशासनिक प्रक्रिया है। शासन की ओर से दलील दी गई कि प्रतिनियुक्ति पर काम करने वाले कर्मचारी को संबंधित संस्थान में अनिश्चितकाल तक बने रहने का अधिकार नहीं मिलता। इसलिए केवल इस आधार पर प्रतिनियुक्ति समाप्त करने के आदेश को अवैध नहीं माना जा सकता कि संबंधित कर्मचारी उसी संस्थान में काम जारी रखना चाहता है।

हाईकोर्ट ने प्रतिनियुक्ति को बताया अस्थायी व्यवस्था

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस बीडी गुरु की सिंगल बेंच ने कहा कि प्रतिनियुक्ति मूल रूप से अस्थायी प्रशासनिक व्यवस्था होती है। सामान्य परिस्थितियों में प्रतिनियुक्ति समाप्त कर कर्मचारी को मूल पदस्थापना पर वापस भेजने के लिए विशिष्ट कारण बताना आवश्यक नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी आदेश को कानून के विपरीत या दुर्भावना से प्रेरित बताते हुए न्यायिक हस्तक्षेप का आधार प्रस्तुत किया जाता है, तो न्यायालय उसकी जांच कर सकता है। लेकिन इसके लिए पर्याप्त आधार और साक्ष्य होना जरूरी है।

एफआईआर दर्ज होना अपने आप में आरोप का प्रमाण नहीं

हाईकोर्ट ने कथित फर्जी दस्तावेजों और दुर्भावना से कार्रवाई किए जाने के आरोपों पर भी विचार किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी मामले में एफआईआर दर्ज होने मात्र से यह साबित नहीं हो जाता कि संबंधित प्रशासनिक आदेश फर्जी दस्तावेजों या दुर्भावनापूर्ण कारणों पर आधारित था। न्यायालय के अनुसार, याचिकाकर्ता अपने आरोपों को पर्याप्त साक्ष्यों के आधार पर स्थापित नहीं कर सकीं। ऐसे में कोर्ट ने राज्य शासन के आदेश और शिकायत निवारण समिति के निर्णय में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

Chhattisgarh Government Order: महिला प्राचार्य को नहीं मिली राहत

हाईकोर्ट ने प्रतिनियुक्ति समाप्त करने के राज्य शासन के आदेश को चुनौती देने वाली प्रीति तिवारी की याचिका खारिज कर दी। इस फैसले में कोर्ट ने प्रतिनियुक्ति की अस्थायी प्रकृति और कर्मचारी के मूल पद पर वापस भेजे जाने के प्रशासनिक अधिकार को महत्वपूर्ण माना। फैसले का मुख्य संदेश यह है कि प्रतिनियुक्ति पर काम करने वाले कर्मचारी को संबंधित संस्थान में स्थायी रूप से बने रहने का स्वतः कानूनी अधिकार नहीं मिलता। वहीं, प्रशासनिक आदेश को दुर्भावनापूर्ण या अवैध बताकर चुनौती देने के लिए पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत करना जरूरी है।

Updated on:
18 Oct 2026 08:05 pm
Published on:
18 Oct 2026 08:05 pm