बिलासपुर

एलबी शिक्षकों के लिए खुशखबरी! बिलासपुर हाईकोर्ट के फैसले से बढ़ी पेंशन की उम्मीद

LB cadre pension case: शिक्षक एलबी संवर्ग की पेंशन पात्रता से जुड़े मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की रिट अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि सरकार को आदर्श नियोक्ता की तरह नीतिगत निर्णय लेना चाहिए।
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Chhattisgarh High Court
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट(photo source- Patrika)

Chhattisgarh Teachers Pension: छत्तीसगढ़ के हजारों शिक्षक एलबी संवर्ग कर्मचारियों से जुड़े पेंशन विवाद में हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार द्वारा दायर रिट अपील को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि सिंगल बेंच ने सरकार की नीति में हस्तक्षेप नहीं किया था, बल्कि शासन को एक आदर्श नियोक्ता की तरह कार्य करते हुए मामले पर पुनर्विचार करने का अवसर दिया था।

इस फैसले को शिक्षक एलबी संवर्ग के लिए बड़ी राहत और उनकी लंबे समय से चली आ रही मांग को मजबूती देने वाला माना जा रहा है। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने यह आदेश पारित किया। कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि कर्मचारियों के एक बड़े वर्ग से जुड़े इस मामले में सरकार को संवेदनशीलता और न्यायसंगत दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

Chhattisgarh High Court: जानिए क्या है पूरा मामला?

मामले की शुरुआत तब हुई जब परमेश्वर प्रसाद जायसवाल (व्याख्याता एलबी) सहित अन्य शिक्षक एलबी संवर्ग के कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्होंने वर्षों तक शिक्षाकर्मी के रूप में सेवाएं दीं और बाद में 1 जुलाई 2018 को उन्हें स्कूल शिक्षा विभाग में नियमित शासकीय सेवा में समाहित किया गया।

वर्तमान नियमों के अनुसार पेंशन पाने के लिए कम से कम 10 वर्ष की शासकीय सेवा आवश्यक है। शासन द्वारा इन कर्मचारियों की सेवा अवधि की गणना 1 जुलाई 2018 से की जा रही थी। इसका परिणाम यह हुआ कि कई ऐसे शिक्षक, जिन्होंने शिक्षाकर्मी के रूप में 10 से 15 वर्ष या उससे अधिक समय तक सेवाएं दी थीं, वे भी पेंशन के लिए 2028 से पहले पात्र नहीं माने जा रहे थे। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि उनकी पूर्व सेवा को पूरी तरह नजरअंदाज करना न्यायसंगत नहीं है और पेंशन पात्रता तय करते समय शिक्षाकर्मी के रूप में दी गई सेवा अवधि को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

सिंगल बेंच ने क्या कहा था?

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने सरकार को सीधे पेंशन देने का आदेश नहीं दिया था। इसके बजाय कोर्ट ने राज्य शासन को इस विषय पर नीतिगत स्तर पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया था। सिंगल बेंच का मानना था कि यह केवल कुछ कर्मचारियों का नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में कर्मचारियों के अधिकारों और भविष्य से जुड़ा विषय है। कोर्ट ने सरकार से अपेक्षा की थी कि वह मामले का व्यापक परीक्षण कर एक स्पष्ट और न्यायसंगत नीति तैयार करे।

सरकार ने क्यों दी थी चुनौती?

राज्य सरकार ने सिंगल बेंच के आदेश को डिवीजन बेंच में चुनौती देते हुए रिट अपील दायर की थी। सरकार का तर्क था कि यह विषय पहले ही तय किया जा चुका है और सिंगल बेंच का आदेश पहले से निर्णयित मुद्दे को दोबारा खोलने जैसा है। शासन का कहना था कि अदालत के निर्देश से प्रशासनिक और नीतिगत मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप की स्थिति बन सकती है। हालांकि, डिवीजन बेंच ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और कहा कि सिंगल बेंच ने किसी नीति में बदलाव नहीं किया था तथा न ही कोई अंतिम निर्णय थोपने की कोशिश की थी।

pension eligibility teachers: डिवीजन बेंच की अहम टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि सिंगल बेंच ने सरकार को केवल इस विषय पर पुनर्विचार करने के लिए कहा था, जो पूरी तरह न्यायसंगत और वैधानिक है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस निर्देश को न्यायिक अतिक्रमण नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि शासन को एक “आदर्श नियोक्ता” की तरह व्यवहार करना चाहिए और ऐसे मामलों में कर्मचारियों के हितों को ध्यान में रखते हुए संतुलित निर्णय लेना चाहिए।

कर्मचारियों के पूरे वर्ग से जुड़ा है मुद्दा

डिवीजन बेंच ने यह भी माना कि यह किसी एक कर्मचारी या कुछ याचिकाकर्ताओं का मामला नहीं है, बल्कि शिक्षक एलबी संवर्ग सहित कर्मचारियों के एक बड़े वर्ग से जुड़ा प्रश्न है। इस मुद्दे के कारण लगातार मुकदमेबाजी बढ़ रही है और समान प्रकृति के अनेक मामले अदालतों तक पहुंच रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि यदि शासन स्तर पर इस विषय में एक स्पष्ट, तर्कसंगत और पारदर्शी आदेश पारित किया जाता है, तो इससे न केवल विवादों में कमी आएगी बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही भी बढ़ेगी।

Updated on:
24 Jun 2026 06:59 am
Published on:
24 Jun 2026 06:59 am