Women’s Day 2026: किसी महिला के जीवन में सबसे बड़ा झटका तब लगता है, जब कम उम्र में वह विधवा हो जाए या वैवाहिक रिश्तों के टूटने के बाद अकेली पड़ जाए।
Women’s Day 2026: किसी महिला के जीवन में सबसे बड़ा झटका तब लगता है, जब कम उम्र में वह विधवा हो जाए या वैवाहिक रिश्तों के टूटने के बाद अकेली पड़ जाए। ऐसे समय में समाज की तिरछी नजरें, आर्थिक परेशानियां और मानसिक पीड़ा उसके सपनों को थाम लेती हैं। लेकिन बिलासपुर में एक प्रयास ऐसा भी है, जिसने इन टूटे सपनों को फिर से रंग देना शुरू किया है।
सामाजिक कार्यकर्ता दीपा गुप्ता पिछले दो दशकों से विधवा, तलाकशुदा और निर्धन महिलाओं को नया जीवन देने की मुहिम चला रही हैं। उनके प्रयासों से अब तक 100 से अधिक महिलाओं के जीवन में फिर से खुशियों की शुरुआत हो चुकी है।
अखिल भारतीय कसौंधन वैश्य महासभा ट्रस्ट की राष्ट्रीय महिला सदस्य दीपा गुप्ता का मानना है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो तो कोई भी काम असंभव नहीं होता। वे पिछले 20 वर्षों से समाज के वरिष्ठ सदस्यों के सहयोग से उन महिलाओं की जिंदगी संवारने का काम कर रही हैं, जिनके जीवन में किसी कारणवश अंधेरा छा गया था। दीपा बताती हैं कि कई बार पति की असमय मृत्यु या वैवाहिक रिश्तों में दरार के कारण महिलाएं मानसिक और आर्थिक रूप से बेहद कमजोर हो जाती हैं।
ऐसे समय में परिवार भी टूट जाता है। इन परिस्थितियों में उनकी टीम अलग-अलग जिलों और गांवों में जाकर महिलाओं और उनके परिवारों से संपर्क करती है और उन्हें यह भरोसा दिलाती है कि जीवन यहीं खत्म नहीं होता, बल्कि एक नई शुरुआत भी संभव है।
परिवार की सहमति मिलने के बाद योग्य वर की तलाश शुरू की जाती है। जब दोनों पक्षों को उपयुक्त जीवनसाथी मिल जाता है, तो परिवारों के बीच बैठक कर परिचय कराया जाता है। सहमति बनने पर सामाजिक रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह कराया जाता है और जरूरत पडऩ़े पर आर्थिक सहयोग भी दिया जाता है।
दीपा गुप्ता के अनुसार अब तक 100 से अधिक विधवा, तलाकशुदा महिलाओं और निर्धन कन्याओं का विवाह कराया जा चुका है। इनमें से कई महिलाएं आज अपने परिवार की जिम्मेदारी संभालते हुए बुजुर्ग माता-पिता का सहारा बनी हुई हैं। इतना ही नहीं, वे अब समाज में आगे बढकऱ अन्य जरूरतमंद महिलाओं की मदद भी कर रही हैं।
दीपा का कहना है कि हर माता-पिता का सपना होता है कि उनकी बेटी खुशहाल जीवन जिए। लेकिन जब किसी अनहोनी से बेटी की दुनिया उजड़ जाती है, तो माता-पिता भी टूट जाते हैं। ऐसे परिवारों को फिर से उम्मीद देना ही उनके प्रयास का मुख्य उद्देश्य है। वह संयुक्त परिवार की परंपरा को बढ़ावा देने की पहल भी कर रही हैं। उनका कहना है कि जो बहुएं 10 साल या उससे अधिक समय से संयुक्त परिवार में रहकर सास-ससुर और परिजनों की सेवा कर रही हैं, उन्हें सामाजिक मंच पर सम्मानित किया जाएगा। ताकि परिवार की इस परंपरा को नई पीढ़ी तक मजबूत संदेश मिल सके।