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‘लागान’ से लेकर ‘रंग दे बसंती’: फिल्मों ने कैसे देशभक्ति की विभिन्न परतों को छुआ?

Story Of freedom:'लगान' और 'रंग दे बसंती' जैसी फिल्मों ने यह दिखाया है कि भारतीय सिनेमा ने देशभक्ति को सिर्फ नारे या जंग तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसकी विभिन्न परतों और भावनाओं को गहराई से छुआ है...

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Aug 14, 2025
भारतीय सिनेमा ने देशभक्ति को सिर्फ नारे या जंग तक सीमित नहीं रखा

Films: सिनेमाई देशभक्ति फिल्मों ने जगाई आजादी की अलख हिंदी सिनेमा ने गुलामी की जकड़न में बंधे देशवासियों के भीतर राष्ट्रबोध जगाने का ऐसा कार्य किया, जो किसी अखबार के लेख, कविताओं या भाषणों से कहीं अधिक प्रभावी और जीवंत था। सिनेमा उस दौर का सबसे नया और असरदार माध्यम था।

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फिल्मों ने कैसे देशभक्ति की विभिन्न परतों को छुआ?

थियेटर में फिल्में देखने आने वाला दर्शक सिर्फ मनोरंजन ही नहीं, बल्कि एक राष्ट्र की चेतना का बीज भी साथ ले जाता था। परदे पर गाए गए गीत, दिखाए गए दृश्य और सुनाए गए संवाद, आम भारतीयों के दिल-दिमाग में आजादी की अलख जगाने का काम करते थे। वर्ष 1913 में जब दादा साहेब फाल्के की 'राजा हरिश्चंद्र' बनी, तो उसके धार्मिक-नैतिक संदेश भी औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ एक सांस्कृतिक चेतना के रूप में देखे गए। आने वाले दशकों में, 1930 और 40 के दशक में बनी फिल्मों ने सीधे-सीधे आजादी के आंदोलन की भावनाओं को पर्दे पर उतारना शुरू किया। लेखकों और संगीतकारों ने गीतों के माध्यम से संदेश पहुचाने का रास्ता निकाला।

स्वतंत्रता आंदोलन की सांस्कृतिक

फिल्म 'किस्मत' (1943) का गीत "दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है" आज भी स्वतंत्रता आंदोलन का सांस्कृतिक दस्तावेज माना जाता है। कवि प्रदीप का यह गीत महज गाना नहीं था, बल्कि ब्रिटिश हुकूमत को ललकारने वाला नारा था। इसमें हिमालय, मंदिर, मस्जिद, ताजमहल और गुरुद्वारों का जिक्र करके पूरे भारत की सांस्कृतिक एकता को आजादी के प्रतीक के रूप में सामने लाया गया।

स्वतंत्रता संग्राम का सहभागी

इसी तरह वी. शांताराम की 'डॉ. कोटिनिस की अमर कहानी' (1946) में चीन की आजादी के संघर्ष को दिखाया गया, लेकिन यह भारतीयों को भी अपने देश की मुक्ति के लिए प्रेरित करता था। गीत "गुलाम नहीं तू, जोश में आ" सुनते हुए दर्शक समझ जाते थे कि यह संदेश भारत के लिए भी है। 1946 की 'जिंदगी सपना नहीं' में "सीना ताने हुए, दिल में ठाने हुए, जाके सेवा करेंगे" और 1943 की 'प्रेम संगीत' में "माताए भी, बहनें भी लडने को दीवानी हैं" जैसे गीतों ने समाज के हर वर्ग को स्वतंत्रता संग्राम का सहभागी बताया।

फिल्में केवल गीतों के माध्यम से ही नहीं

फिल्में केवल गीतों के माध्यम से ही नहीं, बल्कि कहानी, पात्रों और पोस्टरों के जरिए भी आजादी का संदेश देती थीं। 1936 की 'करोड़पति' ने ब्रिटिश शिक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी। उसके गीतों ने बेरोजगारी और 'डिग्रीधारियों' की विडंबना को उजागर किया, जो उस दौर की हताशा और अंग्रेजी सत्ता पर व्यंग्य का आईना था। 1943 में बनी 'शकुंतला' जैसे पौराणिक कथानकों को पर्दे पर उतारना महज धार्मिक मनोरंजन नहीं था, बल्कि भारत की सांस्कृतिक जड़ों की याद दिलाना भी था, जो उपनिवेशवाद के सामने अपनी पहचान बनाए रखे हुए थीं।

आजाद हिंद फौज की ओर इशारा

1944 में प्रभात फिल्म कंपनी की 'चांद' में कहानी भले ही प्रेमकथा थी, लेकिन गीत "वतन से चला है वतन का सिपाही" ने सीधे आजाद हिंद फौज की ओर इशारा किया और दर्शकों में देशभक्ति की भावना जगाई। उस दौर में ग्रामोफोन भारतीय समाज की आवाज़ था। बोलती फिल्मों के बावजूद गीत पहले ग्रामोफोन पर ही रिकॉर्ड होते थे और वहीं से जन-जन तक पहुँचते थे। कई बार ब्रिटिश सेंसर ने फिल्मों पर कैंची चलाई, लेकिन गीत ग्रामोफोन के सहारे लोगों के बीच आजादी के पैगाम की तरह फैलते रहे।
जैसे 'लेफ्टिनेंट' फिल्म (निर्देशक नारी गदी अली) का कोई प्रिंट आज मौजूद नहीं है, लेकिन उसके गीत "दुश्मन की छाती पर झंडा गाड़ के हम लहराएंगे'आज भी आर्काइव में सुनाई देते हैं और वही पुराना जोश भर देते हैं। यह एक विडंबना थी कि भारत अंग्रेजो की गुलामी झेल रहा था, लेकिन भारतीय सैनिकों को ब्रिटिश हुकूमत ने जापान और जर्मनी के खिलाफ लड़ाई में झोंक दिया।

आजाद हिंद फौज का निर्माण

यही वह दौर था जब सुभाष चंद्र बोस ने इन्हीं देशों की मदद से आजाद हिंद फौज का निर्माण किया। फिल्मकारों ने इस विसंगति को अपने गीतों और कथाओं में दर्ज किया, लेकिन कई फिल्में सेंसरशिप की भेंट चढ़ गईं। फिर भी गीत और संवाद जनता के दिलों में अपनी जगह बना चुके थे। स्वतंत्रता के बाद भी सवाल उठे कि जो राज्यतंत्र हमें मिला, उसमें भारतीय तत्व कितना था और औपनिवेशिक ढाँचे का बोझ कितना। यही सवाल फिल्मों में भी दिखता है। आजादी मिल गई, लेकिन विभाजन की त्रासदी और औपनिवेशिक ढाँचे की छाया बनी रही। कई फिल्मों ने इन सवालों को भी उठाया—कभी सीधे, कभी परोक्ष रूप से।

भारतीय सिनेमा में राष्ट्रवाद

आज के संदर्भ में देखें तो भारतीय सिनेमा में राष्ट्रवाद की धारा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। आज़ादी के बाद से लेकर वर्तमान तक कई फिल्मों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया है। 'शहीद' (1965) और 'भारत माता' (1957) ने स्वतंत्रता संग्राम को सीधे-सीधे पेश किया, तो 'लगान' (2001) ने औपनिवेशिक शोषण के विरुद्ध खेल के माध्यम से प्रतिरोध की कहानी कही। 'रंग दे बसंती' (2006) ने युवाओं को भगत सिंह के आदर्शों से जोड़ते हुए आधुनिक भारत में भ्रष्टाचार और अन्याय के खिलाफ़ खड़े होने का संदेश दिया।

Published on:
14 Aug 2025 05:44 pm
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