
Raj Kapoor Peshawar Haveli: भारतीय सिनेमा के महान कलाकारों में गिने जाने वाले राज कपूर से जुड़ी ऐतिहासिक धरोहर एक बार फिर चर्चा में है। पेशावर स्थित उनकी पुश्तैनी हवेली का एक हिस्सा हाल ही में भारी बारिश और भूकंप के झटकों के कारण क्षतिग्रस्त हो गया है। इस घटना ने न सिर्फ स्थानीय प्रशासन बल्कि इतिहास और सिनेमा प्रेमियों के बीच भी चिंता बढ़ा दी है।
करीब एक सदी पुरानी यह हवेली कभी कपूर परिवार की पारिवारिक पहचान का केंद्र रही है। बताया जाता है कि लगातार हुई बारिश से पहले ही इसकी संरचना कमजोर हो चुकी थी और उसके बाद आए भूकंप ने इसकी स्थिति को और नाजुक बना दिया। हवेली की दीवार का एक हिस्सा गिरने से यह आशंका और गहरी हो गई है कि यदि जल्द संरक्षण कार्य शुरू नहीं हुआ तो यह ऐतिहासिक इमारत गंभीर खतरे में पड़ सकती है।
इस हवेली को पाकिस्तान सरकार ने वर्ष 2016 में राष्ट्रीय विरासत का दर्जा दिया था। इसके बावजूद लंबे समय से इसकी मरम्मत और संरक्षण को लेकर ठोस कदम नहीं उठाए जा सके। अब स्थानीय विरासत विशेषज्ञों और सांस्कृतिक संगठनों ने सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की अपील की है ताकि इस धरोहर को पूरी तरह नष्ट होने से बचाया जा सके।
पृथ्वीराज कपूर के परिवार से जुड़ी यह हवेली न सिर्फ कपूर खानदान के इतिहास का हिस्सा रही है बल्कि भारतीय सिनेमा की शुरुआती पीढ़ी की यादों से भी गहराई से जुड़ी हुई है। यही वह स्थान है जहां राज कपूर और उनके चाचा त्रिलोक कपूर का जन्म हुआ था। इस कारण यह भवन भारत और पाकिस्तान दोनों देशों की साझा सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक माना जाता है।
करीब 40 कमरों वाली ये विशाल हवेली अपने समय की शानदार वास्तुकला का उदाहरण मानी जाती थी। इसके मुख्य हिस्से में बने झरोखे और फूलों की नक्काशी उस दौर की कलात्मक परंपरा को दर्शाते थे। हालांकि वर्षों तक उपेक्षा के कारण अब इसकी भव्यता काफी हद तक प्रभावित हो चुकी है, फिर भी इसकी ऐतिहासिक पहचान आज भी बरकरार है।
बताया जाता है कि 1947 के विभाजन के बाद कपूर परिवार ने पेशावर छोड़कर भारत का रुख किया और तभी से यह हवेली लगभग वीरान पड़ी रही। समय-समय पर कपूर परिवार के सदस्य यहां आते रहे, जिससे इस स्थान के प्रति भावनात्मक जुड़ाव बना रहा।
बाद के वर्षों में ऋषि कपूर और रणधीर कपूर ने भी इस हवेली का दौरा किया था और इसे संरक्षित करने की आवश्यकता पर जोर दिया था। अब एक बार फिर इस ऐतिहासिक इमारत को बचाने की मांग तेज हो गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते संरक्षण कार्य शुरू नहीं किया गया तो यह केवल एक भवन का नुकसान नहीं होगा, बल्कि उपमहाद्वीप की साझा सांस्कृतिक स्मृतियों को भी गहरी क्षति पहुंचेगी। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि संबंधित विभाग जल्द ही ठोस कदम उठाकर इस विरासत को सुरक्षित करने की दिशा में पहल करेंगे।