
Udta Teer Movie Review: देशभक्ति याद है लेकिन देश याद नहीं, ये लाइन इस फिल्म को देखने के बाद सबसे पहले आपको याद आएगी। अब तक आपने कई सारी फिल्में देखी होंगी जिनमें भारतीय जासूस या फिर पाकिस्तानी जासूसों को अपने देश के लिए मर-मिटते हुए देखा होगा लेकिन आयुष्मान खुराना और सारा अली खान की फिल्म जरा हटकर है। इस फिल्म में पाकिस्तानी एजेंट है जो अपना मुल्क ही भूल जाता है। वो भूल जाता है कि वो किस मिशन के लिए आया था और उसका मकसद आखिर है क्या। फिल्म में कॉमेडी का तड़का भी लगाया गया है और देशभक्ति का जामा पहनाकर दर्शकों के सामने पेश भी किया गया है। तो चलिए अब बिना देर किए आपको बता देते हैं आखिर कैसी है आयुष्मान-सारा की फिल्म 'उड़ता तीर'।
सबसे पहले बात करते हैं इस फिल्म की कहानी की। कहानी शुरू होती है काउंटर टेरररिज्म स्क्वॉड के मिशन से जिन्होंने पाकिस्तान के खूंखार आतंकवादी अजहर मकसूद को घेरकर बॉम्ब से उड़ाने का पूरा प्लान बना लिया है लेकिन फिर एक बेगुनाह बच्चे को वहां आस-पास देखने के बाद विक्रांत उसे बचाने के लिए पूरे मिशन को ही ताक पर रख देता है। विक्रांत अजहर मकसूद के पीछे भागते-भागते पाकिस्तान चला जाता है और वहां से अचानक सही-सलामत वापस भी आ जाता है।
एक बार तो देखने से समझ में ही नहीं आता कि विक्रांत ऐसे बॉर्डर के उस पार से सही-सलामत वापस आ कैसे जाता है और इसलिए उसका दोस्त उसपर शक भी करता है लेकिन फिर खुलासा होता है कि विक्रांत तो दरअसल पाकिस्तानी एजेंट है और अपने माता-पिता की हत्या का बदला लेने के लिए वो हिंदुस्तान आया है। वहीं उसकी निजी जिंदगी में उसने हिंदुस्तानी लड़की यामिनी से शादी कर ली है जिससे वो जल्द ही तलाक लेने वाला है। हाफिल्लांम कि इसके बाद जिंदगी में तूफान की एंट्री तब होती है जब विक्रांत एक्सीडेंट के बाद अपनी याददाश्त खो बैठता है और भूल जाता है कि उसका असली नाम बिलाल अहमद है। बस यही से एक ऐसी कन्फ्यूजन शुरू होती है जो फिल्म के आखिर तक खत्म ही नहीं होती। इसके आगे क्या होता है और क्या विक्रांत उर्फ बिलाल अहमद अपने माता-पिता की मौत का बदला ले पाता है या फिर नहीं, इसके लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी।
आयुष्मान ने बतौर एक्टर काम अच्छा किया है। उन्हें जो रोल मिला था, जैसा मिला था उसमें उन्होंने अपनी तरफ से कोई कमी छोड़ी नहीं है। हालांकि बहुत जगह पर उन्हें देखकर महसूस होता है कि आयुष्मान इससे अच्छी और बेहतरीन परफॉर्मेंस करने के लिए जाने जाते हैं। वहीं सारा अली खान ने तो इस फिल्म के लिए हां की ही क्यों, समझ में ही नहीं आता। सारा के लिए बतौर एक्ट्रेस कुछ खास दिखाने के लिए था ही नहीं। सारा का रोल भी फिल्म में कुछ खास है नहीं। वहीं फिल्म के बाकी किरदार कई जगह पर हंसाने में जरूर सफल रहते हैं। राहुल बॉस भी फिल्म में नजर आते हैं और एक ऐसे अनोखे किरदार में नजर आते हैं जिसके लिए वो जाने नहीं जाते हैं।
फिल्म का कन्सेप्ट अच्छा है लेकिन डायरेक्शन और फिल्म को बनाने का अंदाज थोड़ा पसंद नहीं आता है। देशभक्ति के ही ढांचे में इस फिल्म को दिखाया गया है लेकिन फिर इसमें जबरदस्ती की कॉमेडी जोड़ी गई है वो निराश करती है। जब इतना सीरियस टॉपिक हो उसमें फालतू की कॉमेडी डालने से फिल्म क्या बताना चाहती है, वो मकसद कहीं ना कहीं भूल जाती है फिल्म। अचानक फिर आखिर में आते-आते इतनी सीरियस हो जाती है लेकिन उससे पहले उतने सीरियस मिशन में भी बेफजूल की कॉमेडी के घुसने से सारा मजा किरकिरा हो जाता है। फिल्म काे निर्देशन में कहीं ना कहीं डायरेक्टर आकाश ए. कौशिक से थोड़ी चूक जरूर हो गई है।
फिल्म की शुरुआत से लेकर एंडिंग तक, ऐसे कई मौके मिल जाते हैं जिनमें भर-भर के फिल्म में महसूस होने वाली कमियां साफ तौर पर नजर आती है। चीख-चीख कर कमियां कहती है आइए हमें नोटिस करिए। सबसे पहले एक खूंखार आतंकवादी जो भारत में मोस्ट वांटेड है उसे इतना ज्यादा बेवकूफ दिखाया है। वहीं फिल्म के कन्सेप्ट और कॉमेडी में फिल्म के मेकर्स शायद बैलेंस बनाना ही भूल गए। जहां कॉमेडी की जरूरत नहीं वहां पर जबरदस्ती की कॉमेडी देखने को मिलती है और जहां पर लगता है कि फिल्म अब थोड़ी सीधी-सपाट हो जाएगी, थोड़ी समझ में आएगी। वहीं पर ही कोई ऐसा ट्विस्ट आ जाता है जो इंसान पचा ही नहीं पाता।
अब सबसे जरूरी सवाल यहीं है कि इस फिल्म को देखें या फिर नहीं। अगर आप ऐसी फिल्में देखना पसंद करते हैं जिन्हें आप सिर्फ एक ही बार एंटरटेनमेंट के तौर पर देखना चाहोगे और बिना लॉजिक और दिमाग के आप थिएटर्स में जाएंगे तो शायद ये फिल्म आपको अच्छी लगेगी। लेकिन अगर आप इस फिल्म को दिमाग के साथ देखेंगे तो शायद आप आधी फिल्म में से ही उठकर आ जाएंगे क्योंकि आप बहुत सारी चीजें तो आपने ऊपर से ही चली जाएंगी जहां पर आपको लगेगा कि लॉजिक लेफ्ट द चैट।
इस फिल्म को देते हैं 5 में से 2 स्टार्स