बूंदी

राजस्थान का एक ऐसा मंदिर जहां धूम्रपान करने पर शक्ति माता हो जाती है, नाराज..भुगतना पड़ता है, खामियाजा…आखिर क्या है इसके पीछे की परम्परा पढ़िए यह ख़बर

जिले के जजावर कस्बे के झैठाल माता जी मंदिर की अनुठी कहानी है। इस गांव में कोई तम्बाकू का सेवन नही करता है।

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Mar 19, 2018
Bundi district town Jajwar Zaithal Mata ki anuthee kahaanee

बूंदी. बूंदी जिले के जजावर कस्बे के झैठाल माता जी मंदिर की अनुठी कहानी है। यहां कोई भी सदस्य तम्बाकू का सेवन नही करता है। लोगो में डर कहे या आस्था लेकिन गांव के तीन सौ सदस्य इन बूरी चींजों से दूर ही रहते है। झैठाल माता के प्रति लोगो में इतनी आस्था है कि नवरात्र में यहां लोग दर्शनों के लिए दूर-दराज से आते है। मंदिर के पूजारी (भोपा)इस परम्परा जीवित किए हुए है।

मौजूदा दौर में जहां बच्चें , बुर्जग ,युवा से लेकर महिलाएं तक धुम्रपान की आदी हो रही है । बुर्जग लोग चौपालों में हुक्कें का उपयोग करते थे जो मध्यम वर्ग बीड़ी और युवा पीढ़ी सिगरेट,पान मसालें का भरपुर इस्तेमाल कर रही है ।वही जजावर कस्बें के झैठाल माताजी के पुजारी (भोपा) अपने पूर्वजों की परम्परा के अनुसार तम्बाकू युक्त सामग्री को सेवन करना तो दुर छुते तक नही है ।

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झैठाल माताजी के पुजारी (भोपा) वर्तमान में करीब 350 सदस्य है लेकिन कोई भी बीड़ी, सिगरेट ,जर्दा के हाथ के हाथ नही लगाते है जो कि समाज के लिए अनुठी मिसाल है । तम्बाकूयुक्त सामग्री के हाथ लगाना श्राप माना जाता है । यह अपवाद स्वरूप बचपनें में या गलती से जिसने भी इसका सेवन किया है । उसको खमियाजा भुगतना पड़ा है ।

मेहमांनवाजी भी लकड़ी से -

आज के समाज बीड़ी ,सिगरेट मेंहमानों की खतिरदारी का प्रमुख हिस्सा बन गया है लेकिन घर पर मेहमान आ जाने पर खतिरदारी कैसे हो । इस पर देवी लाल भोपा ने बताया कि हम तम्बाकूयुक्त सामग्री का सेवन नही करते है । लेकिन मेंहमान के आने की परिस्थति में प्लास्टिक थैली में रखवाकर लकड़ी या किसी अन्य वस्तु से उठाते है ।

पूर्वजों की मान्यता माताजी का श्राप -

पूर्वजों की मान्यता के अनुसार तम्बाकुयक्त सामग्री को सेवन करना मतलब माताजी का श्राप मिलना । किशन लाल भोंपा ने बताया कि हमारे पूर्वजों के समय से ही तम्बाकुयुक्त सामग्री पर प्रतिबन्ध है । जिसकों हम आज तक निभा रहे है । वही माधों लाल भोंपा ने बताया कि यदि किसी ने गलती से या बचपने में तम्बाकूयक्त सामग्री का सेवन किया तो उसकों भी उसका भारी नुकसान का खमियाजा भुगतना पड़ा है जो कि माताजी का श्राप है ।

मंदिर का इतिहास -

इसका नामकरण रघुवीर सिंह राजा के शासनकाल में हुआ। झैटाल माताजी का मंदिर 1632 सवत् में बना। मूर्ति स्थापना के समय मल सिहं व मल्लोंप सिहं दोनो का शासन था। यहां के प्रथम पुजारी धुधा लाल थे । जिनकी माता का नाम सुरजा बाई था । जिनके वंशज (भोपा) आज भी झैटाल माताजी की पुजा अर्चना करते है

Updated on:
19 Mar 2018 03:02 pm
Published on:
19 Mar 2018 01:51 pm