प्रदेश के देवस्थान विभाग के अधीन आने वाले रियासतकालीन मंदिरों का अब आमजन इतिहास जान सकेंगे।
बूंदी. प्रदेश के देवस्थान विभाग के अधीन आने वाले रियासतकालीन मंदिरों का अब आमजन इतिहास जान सकेंगे।
प्रवेश द्वार पर मंदिरों के नामों का उल्लेख होने के साथ अंदर संबंधित मंदिरों का इतिहास अंकित कराया जा रहा है, ताकि आमजन को इन मंदिरों के बारे में जानकारी हासिल रहे कि कौनसा मंदिर कितना पुराना है,कब बना था और क्या-क्या खूबी है और कितना रियासतकालीन है। इसको लेकर देवस्थान विभाग ने प्रक्रिया शुरु कर दी है। प्रदेश के 593 व बूंदी जिले के 14 मंदिर है।
इधर,विभागीय अधिकारियों का कहना है कि इन रियासतकालीन मंदिरों की लोगों में पहचान बने इसको लेकर विभाग ने बदलाव करते हुए यह प्रक्रिया शुरु की है। मंदिर से जुड़े लोगों का कहना है कि मंदिर का इतिहास अंकित करने से हिंदू संस्कृति को जानने का पर्यटकों को भी लाभ मिल सकेगा। देखने में आया है कि देवस्थान विभाग के अधीन आने वाले मंदिर काफी पुराने और प्राचीन है। कई मंदिरों के नामों और इतिहास से भी लोग अनजान है। ऐसे में विभाग ने मंदिरों के इतिहास के बारे में रूबरू कराने और मंदिर की क्या विशेषता है इसके बारे में जानने में लोगों को मिलेगा। प्रत्येक मंदिर का सात हजार रुपए का बजट जारी किया गया है। इसमें मंदिर में नाम के साथ एक साइन बोर्ड में मंदिर का इतिहास के साथ उसको लगाया जाएगा।
जिले के यह है मंदिर
बूंदी जिले में देवस्थान विभाग के अधीन जिले के 14 मंदिरों में यह प्रक्रिया शुरु कर दी गई है। इसमें श्री रंगनाथ जी, श्री अखाडा हनुमानजी, तिलक चौक स्थित श्री चारभुजा, रानी जी की बावडी स्थित श्रीचारभुजा,श्री गोपाल लालजी,श्री सथूर माताजी,श्रीकेशवराय जी, श्रीरंगनाथ, गोविन्दनाथ, श्रीपीताम्बरराय, श्रीरंगनाथ,राधा दामोदर, हनुमानजी व धर्मशाला एवं गोकुल चन्द्रमाजी मंदिर शामिल है।
कई नाम धुंधले, इतिहास भी नहीं
देवस्थान विभाग के अधीन आने वाले मंदिर काफी वर्षों पुराने है। इनका सरंक्षण नहीं होने से कई मंदिरों के नाम तक नहीं है। या कुछ धुंधले होने के साथ अक्षर मिट चुके है। यहां तक की मंदिर के बारे में जानकारी भी नहीं है। ऐसे में आमजन को यह तक पता नहीं रहता है यह मंदिर सार्वजनिक है या देवस्थान विभाग का। कई लोगों को परेशानी उठानी पड़ती थी। इस प्रक्रिया से अब आमजन को देवस्थान विभाग के मंदिरों का पता रहेगा।
जीर्ण-शीर्ण को मिले दरकार
रियासतकालीन मंदिर होने के साथ ही कई मंदिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। ऐसे में कई मंदिरों को मरम्मत की दरकार है। छायाकार नारायण मंडोवरा ने बताया कि देवस्थान विभाग के अधीन आने वाले अधिकतर मंदिर जीर्ण-शीर्ण है, जिनको मरम्मत के लिए विभाग से बजट मिलना चाहिए, ताकि इनका रखरखाव होने के साथ सरंक्षण हो सके।
इनका कहना है
देवस्थान विभाग द्वारा उनके अधीन मंदिरों पर लगाएं जा रहे सूचना बोर्ड विभाग की एक अच्छी शुरुआत है। इससे संबंधित मंदिर के इतिहास की और उसके नाम की सभी लोगों को जानकारी हो पाएगी तथा मंदिर से संबंधित अन्य जानकारी भी आम लोगों तक पहुंच पाएगी। इससे छोटीकाशी बूंदी के मंदिरों के संदर्भ में वास्तवित सूचना भी सभी लोगों तक पहुंच पाएगी। राज्य सरकार व देवस्थान विभाग यह अच्छी पहल है।
पुरुषोत्तम पारीक, अध्यक्ष, श्रीचारभुजा विकास समिति,बूंदी
राज्य सरकार और देवस्थान विभाग की ओर से देवस्थान के मंदिरों में मंदिर का साइन बोर्ड और उसके इतिहास लिखने के निर्णय से जहां मंदिर के इतिहास की जानकारी मिलेगी। वहीं विरासत कितनी पुरानी है इसको भी लोग जान पाएंगे। विरासत के संरक्षण और संवर्धन में यह पहला कदम होगा। इसके बाद आम लोगों में भी अपने धार्मिक स्थल के प्रति श्रद्धा बढ़ेगी। इस कदम के बाद इन मंदिरों के जीर्णोद्वार का मार्ग भी प्रशस्त होगा। यह मंदिर भारत की धरोहर और धार्मिक सांस्कृति चेतना जागृत करने के स्थान है। मंदिर का इतिहास अंकित करने से हिंदू संस्कृति को जानने का पर्यटकों को भी लाभ मिल सकेगा।
राजकुमार दाधीच, संयोजक,भारतीय सांस्कृतिक निधि इंटेक,बूंदी
हाड़ौती के 59 में से 55 मंदिरों में बोर्ड लगा दिए
देवस्थान विभाग के अधिन मंदिरों में मंदिर के नामों के साथ इतिहास के बोर्ड लगाए जा रहे है। इससे आमजन को मंदिरों के इतिहास के बारे में जानकारी मिल सकेगी। हाड़ौती के 59 में से 55 मंदिरों में बोर्ड लगा दिए गए है। शेष में भी जल्द लग जाएंगे।
डॉ.ऋचा बलवदा,सहायक आयुक्त,देवस्थान विभाग,कोटा