Credit Card Bill Non Payment Rules: अक्सर क्रेडिट कार्ड का बिल समय पर न चुकाने पर लोगों को जेल जाने का डर सताता है, लेकिन कानूनी रूप से क्रेडिट कार्ड बिल का भुगतान न करना एक सिविल विवाद की श्रेणी में आता है।
Credit Card Rules: क्रेडिट कार्ड का बिल समय पर न भर पाने पर कई लोगों के मन में सबसे बड़ा डर यही रहता है कि कहीं पुलिस घर न आ जाए या जेल की हवा न खानी पड़े। सोशल मीडिया और मैसेजेस में अक्सर ऐसी अफवाहें फैलती हैं कि बिल न भरने पर सीधे जेल हो जाती है। लेकिन क्या यह सच है? विशेषज्ञों के अनुसार, क्रेडिट कार्ड बिल का भुगतान न करना एक सिविल डिस्प्यूट (नागरिक विवाद) है, न कि कोई आपराधिक अपराध। इसलिए सामान्य स्थिति में पुलिस आपको गिरफ्तार नहीं कर सकती और न ही जेल भेज सकती है।
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जब आप क्रेडिट कार्ड का बिल ड्यू डेट पर नहीं भरते, तो बैंक पहले रिमाइंडर भेजता है – एसएमएस, ईमेल और कॉल्स के जरिए। अगर भुगतान नहीं होता, तो रिकवरी एजेंट संपर्क करते हैं। यह प्रक्रिया तनावपूर्ण हो सकती है, लेकिन कानूनी रूप से बैंक का उद्देश्य पैसा वसूलना होता है, सजा देना नहीं। RBI के दिशानिर्देशों के अनुसार, क्रेडिट कार्ड डिफॉल्ट को सिविल मामला माना जाता है। बैंक सिविल कोर्ट में केस दायर कर सकता है, जहां कोर्ट आदेश दे सकता है कि बकाया राशि चुकाई जाए।
जेल का खतरा तभी होता है जब कोर्ट में साबित हो जाए कि आपने जानबूझकर (Willful Defaulter) भुगतान रोका है या धोखाधड़ी की है। उदाहरण के लिए, अगर आपने फर्जी दस्तावेज दिए, जानबूझकर जानकारी छिपाई या बार-बार इरादतन डिफॉल्ट किया, तो मामला आपराधिक श्रेणी में जा सकता है। ऐसी स्थिति में धोखाधड़ी (IPC सेक्शन 420) या कोर्ट अवमानना के आधार पर जेल संभव है। लेकिन महज बिल न भरने से जेल नहीं होती – यह बहुत दुर्लभ मामला है और साबित करना मुश्किल होता है।
इस दौरान क्रेडिट स्कोर खराब होता है, जिससे भविष्य में लोन या नया कार्ड मिलना मुश्किल हो जाता है। RBI के नए नियमों (2026 तक क्रेडिट रिपोर्ट साप्ताहिक अपडेट) से क्रेडिट स्कोर पर असर और तेजी से दिखेगा।
RBI क्रेडिट कार्ड डिफॉल्ट को सिविल विवाद मानता है और रिकवरी एजेंटों पर सख्त नियम लागू करता है – धमकी या बदसलूकी पर शिकायत की जा सकती है। वित्तीय जानकार सलाह देते हैं कि क्रेडिट लिमिट का सिर्फ 30% ही इस्तेमाल करें। उदाहरण: 1 लाख की लिमिट पर 30,000 रुपये से ज्यादा खर्च न करें। इससे कर्ज का बोझ नहीं बढ़ता और पेमेंट आसान रहता है।