EV Batteries: सरकार ने इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियों के लिए आधार जैसा यूनिक पहचान नंबर देने का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत हर बैटरी को 21 कैरेक्टर का बैटरी पैक आधार नंबर दिया जाएगा।
EV Batteries: इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) को लंबी दूरी की यात्रा के लिए भरोसेमंद बनाने की दिशा में सरकार ने पहल की है। इसके तहत देश के प्रमुख एक्सप्रेसवे और हाईवे पर ईवी कमांड सेंटर, चार्जिंग प्वाइंट और रास्ते पर (6096) सहायता पहुंचाने वाला नेटवर्क विकसित करने की योजना है। इसका मकसद इलेक्ट्रिक वाहन चालकों की सबसे बड़ी चिंता मानी जाने वाली 'रेंज एंग्जायटी' यानी रास्ते में बैटरी खत्म होने के डर को कम करना है। इससे ईवी अपनाने को बढ़ावा मिलेगा।
सरकारी स्तर पर इस बात पर सहमति बन रही है कि केवल चार्जिंग स्टेशन बनाना ही काफी नहीं है। जब तक इलेक्ट्रिक वाहनों को यात्रा के दौरान तकनीकी सहायता, आपात मदद और रियल टाइम सपोर्ट नहीं मिलेगा, तब तक लंबी दूरी की ईवी यात्रा को लेकर लोगों का भरोसा पूरी तरह नहीं बन पाएगा। इसे ध्यान में रखते हुए एक्सप्रेसवे-आधारित ईवी सपोर्ट सिस्टम तैयार करने की योजना बनाई जा रही है। सरकार बैटरियों की ऐंड टू ऐंड ट्रैकिंग और बेहतर रीसाइक्लिंग के लिए बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है। सड़क मंत्रालय ने ईवी बैटरियों के लिए आधार जैसा यूनिक पहचान नंबर देने का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत हर बैटरी को 21 कैरेक्टर का बैटरी पैक आधार नंबर (बीपेन) दिया जाएगा। इससे बैटरी के पूरी लाइफ साइकल की निगरानी संभव हो सकेगी। इस सिस्टम का मकसद बैटरी की मैन्युफैक्चरिंग से लेकर इस्तेमाल, रीसाइक्लिंग और फाइनल डिस्पोजल तक की जानकारी ट्रैक करना है।
प्रस्तावित योजना के तहत एक्सप्रेसवे पर ईवी आधारित कमांड और कंट्रोल सेंटर स्थापित किए जाएंगे। ये सेंटर इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए एयर ट्रैफिक कंट्रोल की तरह काम करेंगे। यहां से यात्रा कर रहे इलेक्ट्रिक वाहनों की स्थिति पर नजर रखी जा सकेगी और जरूरत पड़ने पर तुरंत मदद पहुंचाई जाएगी। इन कमांड सेंटरों से तुरंत रास्ते में ही बैटरी से जुड़ी समस्याओं में सहायता, चार्जिंग से संबंधित मार्गदर्शन और वाहन की बेसिक जांच जैसी सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं। इससे अगर कोई वाहन रास्ते में तकनीकी खराबी या बैटरी समस्या के कारण रुक जाता है, तो उसे तुरंत सहायता मिल सकेगी।
सरकार इस पूरे ढांचे को सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल पर विकसित करने पर विचार कर रही है। इसमें वाहन निर्माता कंपनियां, चार्जिंग इंफ्रा प्रोवाइडर्स और निजी रोडसाइड असिस्टेंस कंपनियां शामिल हो सकती हैं। इससे सरकार पर वित्तीय बोझ कम होगा और सेवाओं की गुणवत्ता भी बेहतर होने की उम्मीद है।
सड़क मंत्रालय की ओर से जारी ड्राफ्ट गाइडलाइन के मुताबिक, बैटरी निर्माता या इम्पोर्टर को बाजार में उतारी जाने वाली हर बैटरी और खुद के इस्तेमाल में लाई गई बैटरी के लिए बीपैन जारी करना अनिवार्य होगा। साथ ही बैटरी से जुड़ा डायनामिक डेटा बीपैन के आधिकारिक पोर्टल पर अपलोड करना जरूरी होगा। ड्राफ्ट गाइडलाइंस में बीपैन को 2 किलोवाट से अधिक क्षमता वाली इंडस्ट्रियल बैटरियों पर लागू करने का सुझाव है। लेकिन शुरुआती चरण में ईवी बैटरियों को प्राथमिकता देने की बात कही गई है।
इस योजना के तहत दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में विकसित करने पर विचार किया जा रहा है। करीब 1,300 किलोमीटर लंबे इस एक्सप्रेसवे पर संपूर्ण सहायता प्रणाली तैयार की जी सकती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि इस पूरे मार्ग पर चलने वाले इलेक्ट्रिक वाहनों को चार्जिंग के साथ-साथ तकनीकी और आपात सहायता भी मिलती रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह मॉडल सफल रहता है, तो इसे देश के अन्य प्रमुख एक्सप्रेसवे और राष्ट्रीय राजमार्गो पर भी लागू किया जा सकता है।