
New Gold Monetisation Scheme: भारत में सोना सिर्फ गहना नहीं, बल्कि परिवारों की सबसे भरोसेमंद पूंजी माना जाता है। लेकिन यही सोना देश की अर्थव्यवस्था के लिए लंबे समय से बड़ी चुनौती भी बना हुआ है। हर साल भारत अरबों डॉलर खर्च कर विदेशों से सोना खरीदता है, जबकि देश के घरों और मंदिरों में पहले से हजारों टन सोना रखा हुआ है। अब सरकार इसी निष्क्रिय सोने को अर्थव्यवस्था में लाने की तैयारी कर रही है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि सरकार गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम को नए रूप में शुरू करने पर विचार कर रही है। इस बार सबसे बड़ा बदलाव यह हो सकता है कि ज्वैलर्स को भी इस योजना का हिस्सा बनाया जाए। सरकार का मानना है कि लोगों का भरोसा ज्वैलर्स पर ज्यादा होता है, इसलिए उनके जुड़ने से योजना को पहले के मुकाबले बेहतर रिस्पांस मिल सकता है।
इस बारे में अलग-अलग संस्थानों के अनुमान अलग हैं, लेकिन सभी इस बात पर सहमत हैं कि भारतीय परिवारों और मंदिरों के पास दुनिया का सबसे बड़ा निजी गोल्ड स्टॉक मौजूद है। अनुमानों के अनुसार, भारतीय परिवारों और मंदिरों के पास करीब 25,000 से 30,000 टन सोना हो सकता है। कुछ आकलनों में यह मात्रा 50,000 टन तक बताई गई है। इसकी कुल कीमत कई ट्रिलियन डॉलर के बराबर मानी जाती है। कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज के अनुसार, इसकी कीमत 5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है। यह रकम भारत की जीडीपी की 125 फीसदी है। इतनी बड़ी संपत्ति होने के बावजूद इसका अधिकांश हिस्सा तिजोरियों और लॉकरों में बंद पड़ा रहता है। इससे न तो देश की अर्थव्यवस्था को फायदा मिलता है और न ही यह किसी प्रोडक्टिव काम में इस्तेमाल हो पाता है।
सरकार ने साल 2015 में गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम शुरू की थी। मकसद था कि लोग अपना बेकार पड़ा सोना बैंकों में जमा करें और उस पर ब्याज भी कमाएं। बैंक उस सोने को रिफाइन कर दोबारा बाजार में इस्तेमाल कर सकें। लेकिन इस योजना को अच्छा रिस्पांस नहीं मिला। इसकी कई वजहें थीं। लोग पारिवारिक गहने जमा करने से हिचकते रहे। शुद्धता जांच के लिए गहने गलाने पड़ते थे, जिससे भावनात्मक जुड़ाव आड़े आया। ब्याज आय भी बहुत आकर्षक नहीं थी। साथ ही पूरी प्रक्रिया लोगों को काफी जटिल लगी। इन कारणों के चलते कई वर्षों के बाद भी यह योजना बहुत कम मात्रा में ही सोना जुटा सकी। बाद में सरकार ने इसके कुछ हिस्सों को बंद भी कर दिया।
सरकार और बुलियन इंडस्ट्री का मानना है कि अगर ज्वैलर्स इस योजना का हिस्सा बनते हैं, तो इसका फायदा सिर्फ ग्राहकों को ही नहीं, बल्कि पूरे गोल्ड सेक्टर को मिलेगा। प्रस्ताव के मुताबिक, ज्वैलर्स लोगों से सोना जमा करेंगे, उसकी शुद्धता की जांच कराएंगे और फिर उसे अधिकृत रिफाइनर और बैंकों तक पहुंचाएंगे। इसके बदले उन्हें सर्विस या हैंडलिंग फीस मिलेगी। दूसरी तरफ, ज्वैलर्स को आयातित सोने पर कम निर्भर रहना पड़ेगा। देश में पहले से मौजूद सोना ही उनके लिए कच्चे माल का स्रोत बन सकेगा। इससे उनकी फाइनेंसिंग लागत और इन्वेंट्री मैनेजमेंट दोनों में सुधार आने की उम्मीद है।
चोरी जैसी घटनाओं से बचने के लिए कई लोग अपना गोल्ड लॉकर्स में रखते हैं, जिसके लिए पैसा भी देना होता है। इस स्कीम में गोल्ड जमा करने से चोरी जैसी घटनाओं की चिंता नहीं रहेगी। मैच्योरिटी पर लोगों को कैश या फिजिकल गोल्ड वापस पाने का विकल्प मिलेगा। अगर सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड की तरह इस स्कीम में ब्याज आय का प्रावधान लाया जाता है, तो लोगों को अपने सोने पर इनकम भी हो सकेगी।
केडिया एडवाइजरी के को-फाउंडर और एमडी अजय केडिया ने पत्रिका डॉट कॉम को बताया कि मोटी ब्याज आय और टैक्स से जुड़ा लालच न हुआ तो इस स्कीम में लोगों से अच्छा रिस्पांस मिलना मुश्किल है। उन्होंने कहा, 'भारत में बड़ी संख्या में लोग कैश में गोल्ड खरीदते हैं। सरकारी स्कीम में जमा करने पर व्यक्ति की जवाबदेही बनेगी। ऐसा लोग नहीं चाहेंगे। दूसरी तरफ जूलरी को मेल्ट किया जाएगा, जिससे मेकिंग चार्जेज में दिया गया पैसा वसूल नहीं हो पाएगा'
सरकार के सामने जो प्रस्ताव रखा गया है, उसके मुताबिक लोगों से जमा हुआ सोना पहले रिफाइन होगा। इसके बाद उसे इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रसीद (Electronic Gold Receipt) में बदला जा सकता है। बाद में यही सोना गोल्ड मेटल लोन के जरिए ज्वैलर्स तक पहुंचाया जाएगा। इसका फायदा यह होगा कि घरेलू बाजार की मांग पूरी करने के लिए हर बार विदेशों से नया सोना मंगाने की जरूरत कम पड़ सकती है। अगर यह मॉडल सफल रहा तो देश में मौजूद सोना ही बार-बार इस्तेमाल होने लगेगा।
पिछले कुछ वर्षों में गोल्ड लोन का कारोबार तेजी से बढ़ा है। आज बड़ी संख्या में लोग जरूरत पड़ने पर अपने गहने गिरवी रखकर कर्ज ले रहे हैं। इससे साफ है कि लोग अपने सोने का आर्थिक इस्तेमाल करने के लिए तैयार हैं। इंडस्ट्री का मानना है कि यदि गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम को पहले से आसान, भरोसेमंद और ज्यादा फायदेमंद बनाया जाए तो लोग इसमें भी दिलचस्पी दिखा सकते हैं।
रिपोर्ट मे इंडस्ट्री से जुड़े लोगों के हवाले से बताया गया कि सरकार त्योहारी सीजन से पहले इस नई योजना को लागू करना चाहती है। इसलिए संभावना है कि अगस्त में गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम के नए स्वरूप की घोषणा की जाए। हालांकि, अंतिम फैसला अभी होना बाकी है। सरकार, आरबीआई, बैंक और गोल्ड इंडस्ट्री के बीच लगातार बैठकों का दौर जारी है।