
How to Download Encumbrance Certificate: आपके घर या फ्लैट पर आपकी जानकारी के बिना किसी ने लोन तो नहीं ले रखा? अगर कोई ऐसा करके लोन न चुकाए तो आप पर बड़ी मुसीबत आ सकती है। दिल्ली के कथित 18 करोड़ की धोखाधड़ी के मामले में ऐसा ही हुआ था। किराएदारों ने फ्लैट की फर्जी सेल डीड बनवाकर 18 करोड़ का लोन उठा लिया और फिर चुकाया नहीं। ऐसे में एक बात तो साफ है कि सिर्फ प्रॉपर्टी खरीदते समय ही नहीं, बल्कि उसके मालिकाना हक के पूरे समय के दौरान समय-समय पर लीगल वेरिफिकेशन करते रहना चाहिए।
बेसिक होम लोन के को-फाउंडर और सीईओ अतुल मोंगा ने पत्रिका डॉट कॉम को बताया, 'अगर कोई मकान मालिक यह जानना चाहता है कि उसकी प्रॉपर्टी पर कोई लोन है या नहीं, तो उसे एन्कम्ब्रेंस रिकॉर्ड (Encumbrance Records) की जांच करनी चाहिए और यह देखना चाहिए कि प्रॉपर्टी पर किसी तरह का मॉर्गेज या चार्ज दर्ज तो नहीं है।'
एन्कम्ब्रेंस सर्टिफिकेट (Encumbrance Certificate-EC) एक आधिकारिक दस्तावेज है, जिसे सब-रजिस्ट्रार कार्यालय जारी करता है। इसमें किसी निश्चित अवधि (आमतौर पर 13 से 30 वर्ष) के दौरान संपत्ति से जुड़े सभी पंजीकृत लेनदेन का रिकॉर्ड होता है। इससे किसी प्रॉपर्टी पर मौजूद वित्तीय दायित्व, बंधक (मॉर्गेज), कानूनी दावा या अन्य जिम्मेदारी का पता चलता है। यह सर्टिफिकेट किसी निश्चित समयावधि के दौरान प्रॉपर्टी के साथ हुए इन रजिस्टर्ड ट्रांजेक्शंस के बारे में बताता है:
एन्कम्ब्रेंस सर्टिफिकेट यह प्रमाणित करता है कि संपत्ति "एन्कम्ब्रेंस-फ्री" है या नहीं। यानी उस पर कोई बकाया लोन, कानूनी विवाद या ऐसा दावा तो नहीं है, जो खरीदार के स्वामित्व अधिकारों को प्रभावित कर सकता हो। भारत में कोई भी बैंक क्लियर एन्कम्ब्रेंस सर्टिफिकेट के बिना होम लोन मंजूर नहीं करता। प्रॉपर्टी के टाइटल की कानूनी जांच करने वाले वकील भी सबसे पहले इसी दस्तावेज की पड़ताल करते हैं।
अपने राज्य के आधिकारिक प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन पोर्टल से आप एन्कम्ब्रेंस सर्टिफिकेट प्राप्त कर सकते हैं। जैसे राजस्थान में e-Panjeeyan पोर्टल के जरिए, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश में IGRS पोर्टल के जरिए और कर्नाटक में कावेरी ऑनलाइन सर्विसेस के जरिए इसे प्राप्त किया जा सकता है।
स्टेप 1. इन पोर्टल्स पर जाने के बाद आपको "Citizen Services" या "Online Services" टैब में Encumbrance Certificate services का
ऑप्शन मिलेगा, जिस पर आपको क्लिक करना है।
स्टेप 2. अब आपको अपनी प्रॉपर्टी डिटेल दर्ज करनी है। इसमें जिला और संबंधित सब रजिस्ट्रार ऑफिस दर्ज करना है। प्रॉपर्टी डिटेल में सर्वे नंबर, प्लॉट नंबर या डॉक्यूमेंट नंबर डालना है। अब आपको EC की समयावधि यानी शुरुआती तारीख और आखिरी तारीख दर्ज करनी है। आमतौर पर यह 13 से 30 साल की अवधि होती है।
स्टेप 3. अब आपको नेट बैंकिंग, कार्ड या यूपीआई से पेमेंट करना होगा। ईसी के लिए फीस अलग-अलग राज्य में 100 से 500 रुपये तक होती है।
स्टेप 4. अब जिन राज्यों में रिकॉर्ड डिजिटल हो चुके हैं, वे तुरंत ईसी डाउनलोड की सुविधा दे देंगे। वहीं, दूसरे राज्यों के पोर्टल मैन्युअल प्रोसेसिंग के लिए 2 से 7 वर्किंग डे का समय लेते हैं। ईसी आमतौर पर डिजिटली साइन्ड पीडीएफ के रूप में मिलती है।