HSBC PMI survey: मंगलवार को जारी HSBC का फ्लैश इंडिया कंपोजिट PMI घट गया है, यानी कि देश की प्राइवेट सेक्टर की गतिविधि घट रही है और यह गिरावट तीन साल से ज्यादा समय में सबसे कमजोर स्तर है।
ईरान जंग का असर अब सीधे भारत की अर्थव्यवस्था की रफ्तार पर दिखने लगा है। देश की प्राइवेट सेक्टर की गतिविधि घट रही है और यह गिरावट तीन साल से ज्यादा समय में सबसे कमजोर स्तर है। मंगलवार को जारी HSBC का फ्लैश इंडिया कंपोजिट PMI मार्च में 58.9 से गिरकर 56.5 पर आ गया।
मैन्युफैक्चरिंग साढ़े चार साल के निचले स्तर पर है, इनपुट कॉस्ट जून 2022 के बाद सबसे तेज रफ्तार से बढ़ रही है और महंगाई का दबाव RBI के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है। यह डेटा वित्त वर्ष के आखिरी महीने में आया है और यह बताता है कि जंग की आग अब सिर्फ वेस्ट एशिया में नहीं, भारत की इकोनॉमी में भी लग चुकी है।
PMI यानी परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स यह एक ऐसा पैमाना है जो बताता है कि देश की प्राइवेट सेक्टर की गतिविधि बढ़ रही है या घट रही है। 50 से ऊपर मतलब ग्रोथ, 50 से नीचे मतलब गिरावट। फरवरी में यह 58.9 था यानी मजबूत ग्रोथ लेकिन मार्च में यह 56.5 पर आ गया। यह गिरावट तीन साल से ज्यादा समय में सबसे कमजोर स्तर है।
इसके अलावा भारत की GDP ग्रोथ पिछली तिमाही में पहले ही 8.4 फीसदी से घटकर 7.8 फीसदी पर आ चुकी थी। HSBC के मुताबिक ईरान जंग ने बाजार में अस्थिरता और उपभोक्ताओं में अनिश्चितता पैदा की है जिसका सीधा असर घरेलू मांग पर पड़ा है।
इस पूरी गिरावट में सबसे ज्यादा मार मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर पड़ी है। मैन्युफैक्चरिंग PMI 56.9 से गिरकर 53.8 पर आ गया। यह साढ़े चार साल का सबसे निचला स्तर है। फैक्ट्री आउटपुट की ग्रोथ अगस्त 2021 के बाद सबसे कमजोर रही। कंपनियों ने बताया कि मिडिल ईस्ट का संघर्ष, बाजार की अस्थिरता और बढ़ती महंगाई ये तीन कारण उनकी ग्रोथ पर भारी पड़ रहे हैं।
सर्विस सेक्टर भी इससे अछूता नहीं रहा उसका PMI 58.1 से घटकर 57.2 पर आया। सर्विस सेक्टर भारत की GDP में सबसे बड़ा हिस्सा रखता है इसलिए यहां की सुस्ती पूरी इकोनॉमी पर असर डालती है।
मार्च में भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर रिकॉर्ड स्तर पर मिले। यह सब-इंडेक्स सितंबर 2014 में जोड़े जाने के बाद से अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है। एशिया, यूरोप, अमेरिका और मिडिल ईस्ट हर तरफ से भारतीय मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस कंपनियों को नए ऑर्डर मिले।
दुनिया के बाकी देशों की तुलना में भारत इस संकट में सबसे ज्यादा कमजोर स्थिति में है। क्योंकि भारत अपनी जरूरत का करीब 90 फीसदी क्रूड और करीब आधी नेचुरल गैस आयात करता है। जंग शुरू होने के बाद से क्रूड 40% से ज्यादा उछल चुका है।
इनपुट कॉस्ट में तेल, एनर्जी, खाना, एल्युमिनियम, स्टील और केमिकल्स सब जून 2022 के बाद सबसे तेज रफ्तार से महंगे हुए हैं। HSBC के चीफ इंडिया इकोनॉमिस्ट प्रांजुल भंडारी के मुताबिक कंपनियां अभी इस बढ़ी हुई लागत का एक हिस्सा खुद मार्जिन घटाकर झेल रही हैं। लेकिन यह सिलसिला लंबे समय तक नहीं चल सकता।
जंग शुरू होने से पहले भारत की महंगाई दर 3.21% थी, जो RBI के 4% के टारगेट से काफी नीचे थी और रेट कट की उम्मीदें जगा रही थी। लेकिन अब तस्वीर पलट गई है। क्रूड 40% उछल चुका है, इनपुट कॉस्ट तेज रफ्तार से बढ़ रही है और सेलिंग प्राइस सात महीने के हाई पर है। यानी महंगाई ऊपर जाना तय है। और यहीं RBI की असली मुश्किल शुरू होती है।
अगर महंगाई बढ़ी तो RBI रेट कट नहीं कर सकता। रेट कट नहीं हुआ तो लोन महंगे रहेंगे, इन्वेस्टमेंट सुस्त रहेगा और ग्रोथ और धीमी होगी। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें RBI के पास बहुत कम विकल्प बचते हैं।