
SIP Investment: छोटे शेयरों ने पिछले एक साल में बड़े शेयरों को पीछे छोड़ दिया है। ऐसे में कई एसआईपी निवेशकों के मन में सवाल उठ रहा है कि अब स्मॉल कैप फंड्स में निवेश जारी रखा जाए या नई एसआईपी लार्ज कैप फंड्स की तरफ मोड़ दी जाए। एक्सपर्ट्स की मानें तो सिर्फ बाजार की हालिया परफॉर्मेंस को देखकर एसआईपी रोकना या निवेश की रणनीति बदलना सही कदम नहीं है। असल सवाल यह है कि क्या स्मॉल कैप और मिड कैप फंड्स की तेजी के कारण आपके पूरे पोर्टफोलियो का संतुलन बिगड़ गया है? अगर ऐसा हुआ है तो पोर्टफोलियो को दोबारा तय अनुपात में लाने की जरूरत पड़ सकती है।
Dezerv के को-फाउंडर वैभव पोरवाल का कहना है कि निवेशकों को किसी एक इंडेक्स या मार्केट सेगमेंट की परफॉर्मेंस को देखकर फैसला नहीं लेना चाहिए। सबसे पहले यह देखना जरूरी है कि लार्ज कैप, मिड कैप, स्मॉल कैप, गोल्ड, डेट और ग्लोबल इक्विटी में निवेश का अनुपात आपके वित्तीय लक्ष्य और जोखिम उठाने की क्षमता के मुताबिक है या नहीं। यानी बाजार में कौन सा सेगमेंट तेज भाग रहा है, यह देखने से ज्यादा जरूरी है कि आपके पोर्टफोलियो में किस हिस्से का वैटेज कितना हो गया है।
आनंद राठी वेल्थ के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर भरत राठौड़ भी एसआईपी को सिर्फ बाजार की चाल देखकर बदलने के पक्ष में नहीं हैं। उनका कहना है कि अगर निवेशक की मौजूदा रणनीति तय है, तो उसे उसी के मुताबिक एसआईपी जारी रखनी चाहिए।
मान लीजिए किसी निवेशक ने कई साल पहले अपने पोर्टफोलियो में स्मॉल कैप और मिड कैप फंड्स को करीब 25 फीसदी हिस्सा दिया था। तेजी के बाद अगर इन फंड्स का हिस्सा बढ़कर तय सीमा से काफी ऊपर चला गया है, तो यहां ध्यान देने की जरूरत है। लेकिन अगर स्मॉल कैप और मिड कैप का हिस्सा अभी भी निवेशक की तय योजना के भीतर है, तो केवल हालिया तेजी के कारण निवेश की दिशा बदलने की जरूरत नहीं है।
एक्सपर्ट्स के अनुसार, एसआईपी बंद करना और पोर्टफोलियो को रीबैलेंस करना दो अलग चीजें हैं। एसआईपी यह तय करती है कि हर महीने कितना पैसा निवेश किया जाए, जबकि रीबैलेंसिंग यह तय करती है कि जमा हो चुकी कुल रकम किस एसेट में कितनी होनी चाहिए। इसलिए निवेशक अपनी मासिक एसआईपी जारी रखते हुए अलग से यह समीक्षा कर सकता है कि पुराने निवेश का संतुलन बिगड़ा है या नहीं।
अगर स्मॉल कैप फंड्स ने लंबे समय में अच्छा रिटर्न दिया है और अब आपके पोर्टफोलियो में इनका हिस्सा आपकी तय सीमा से ज्यादा हो गया है, तो नई एसआईपी का पैसा लार्ज कैप या मिड कैप फंड्स की तरफ मोड़ना एक तरीका हो सकता है। भरत राठौड़ के मुताबिक, स्मॉल कैप में करीब 20 से 22 फीसदी हिस्सेदारी को एक रेफ्रेंस के तौर पर देखा जा सकता है। अगर इसका वैटेज इससे काफी ऊपर चला गया है तो निवेशक धीरे-धीरे पोर्टफोलियो को संतुलित करने पर विचार कर सकते हैं।
हालांकि, सभी निवेशकों के लिए स्मॉल कैप की कोई एक तय सीमा नहीं हो सकती। किसी व्यक्ति के लिए 20 फीसदी सही हो सकता है, तो किसी दूसरे के लिए इससे कम या ज्यादा हिस्सा उपयुक्त हो सकता है। यह निवेशक के लक्ष्य और जोखिम लेने की क्षमता पर निर्भर करता है।
मान लीजिए कोई व्यक्ति पिछले 7 साल से हर महीने स्मॉल कैप फंड में एसआईपी कर रहा है। इतने लंबे समय में उसके निवेश का बड़ा कॉर्पस तैयार हो चुका होगा। अब हर महीने आने वाली नई एसआईपी उस कुल रकम का बहुत छोटा हिस्सा होगी। ऐसे में सिर्फ नई एसआईपी को किसी दूसरे फंड में भेजने से पूरे पोर्टफोलियो पर तुरंत बड़ा असर नहीं पड़ेगा। साथ ही, बार-बार एसआईपी की दिशा बदलने से निवेश की आदत भी प्रभावित हो सकती है।
अगर स्मॉल कैप की तेजी ने पोर्टफोलियो का संतुलन बिगाड़ दिया है, तो सिर्फ नई किस्त का रास्ता बदलने के बजाय पुराने निवेश का भी आकलन करना चाहिए। कितना पैसा दूसरी कैटेगरी में शिफ्ट करना है, कितने समय में करना है और इससे कितना टैक्स लग सकता है, इन बातों पर अपने वेल्थ मैनेजर या वित्तीय सलाहकार से चर्चा की जा सकती है।
अगर किसी निवेशक का टार्गेट 5 से 10 साल का है, तो केवल एक साल की बेहतर परफॉर्मेंस की वजह से एसेट एलोकेशन बदलने की जरूरत नहीं है। यानी आज स्मॉल कैप तेज है तो पूरा पैसा वहां लगाना और कल लार्ज कैप तेज हो तो वहां भाग जाना, लंबे समय के निवेश का सही तरीका नहीं माना जा सकता।
पोरवाल के अनुसार, लंबे समय के निवेशकों को अलग-अलग मार्केट कैप वाली कंपनियों में निवेश का संतुलन बनाए रखना चाहिए। बाजार में उतार-चढ़ाव आता रहेगा, लेकिन निवेश की रणनीति में अनुशासन बनाए रखना जरूरी है। लंबी अवधि वाले निवेशक अपनी स्थिति के मुताबिक इक्विटी में 80 फीसदी तक और बाकी 20 फीसदी रकम डेट में रखने पर विचार कर सकते हैं। हालांकि, यह हर निवेशक के लिए एक जैसी सलाह नहीं है। इसे अपने लक्ष्य, जोखिम क्षमता और मौजूदा पोर्टफोलियो के हिसाब से देखना चाहिए।
(डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल सिर्फ जानकारी मात्र है। यह निवेश की सलाह नहीं है। शेयर मार्केट/म्यूचुअल फंड में निवेश जोखिम भरा होता है। कहीं भी पैसा लगाने से पहले अपने निवेश सलाहकार से परामर्श लें।)