SpiceJet गंभीर वित्तीय संकट में है। कर्मचारियों की सैलरी में देरी, स्टाफ कटौती और भारी कर्ज ने हालात बिगाड़ दिए हैं। कंपनी सरकार से नए लोन की उम्मीद कर रही है
SpiceJet Airline: एक तरफ सरकार के फैसलों की खुलकर तारीफ, दूसरी तरफ कंपनी के अंदर हालात ऐसे कि कर्मचारियों की सैलरी तक अटकी हुई है। देश की प्रमुख बजट एयरलाइन SpiceJet आज ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां से निकलना आसान नहीं दिख रहा। हाल ही में जेट फ्यूल की कीमतें बढ़ीं, लेकिन दोगुनी नहीं हुईं। इस पर चेयरमैन Ajay Singh ने सरकार की सराहना की। लेकिन असली कहानी इससे बिल्कुल उलट है।
पिछले कुछ सालों से एयरलाइन लगातार दबाव में है। 2024 में भारी फंड जुटाने के बावजूद कंपनी खुद को संभाल नहीं पाई। अब हालत यह है कि उसके पास अपने सिर्फ करीब 13 विमान ही ऑपरेशन में बचे हैं। जहां दूसरी एयरलाइंस जैसे IndiGo और Air India तेजी से विस्तार कर रही हैं, वहीं SpiceJet सिकुड़ती जा रही है।
कंपनी अब खर्च घटाने के लिए कर्मचारियों पर सख्ती कर रही है। ईटी की एक रिपोर्ट के अनुसार, एयरलाइन करीब 20% स्टाफ कम करने की तैयारी कर रही है। 500 से ज्यादा कर्मचारियों को बिना वेतन छुट्टी दी गई है। वहीं, सैलरी में 2-3 महीने तक की देरी हो रही है। कई कर्मचारियों के लिए यह स्थिति बेहद मुश्किल भरी है। किसी की नई-नई शादी हुई है, किसी के घर में बीमार माता-पिता हैं। लेकिन कंपनी के पास फिलहाल कोई ठोस सोल्यूशन नहीं है।
रिपोर्ट के अनुसार, कई इंजीनियर जिन्होंने दूसरी कंपनियों में जॉइन करने के लिए इस्तीफा दिया था, उनका अचानक नोटिस पीरियड खत्म कर दिया गया। इसका मतलब, बीच के समय में बिना सैलरी रहना पड़ेगा। दूसरी तरफ, पायलट्स के लिए नया कॉन्ट्रैक्ट लाया गया है: 21 दिन काम, 9 दिन छुट्टी। लेकिन सैलरी में करीब 20% तक कटौती।
कंपनी पर हजारों करोड़ का बकाया है। कुल देनदारी करीब 4500 करोड़ रुपये है। जीएसटी, पीएफ और टीडीएस भी कई महीनों से लंबित है। कर्मचारियों का फुल एंड फाइनल भी अटका हुआ है। स्थिति यह है कि पुराने कर्मचारी सोशल मीडिया पर खुलकर नाराजगी जता रहे हैं।
अब कंपनी एक बार फिर सरकार की ओर देख रही है। वह Emergency Credit Line Guarantee Scheme के तहत करीब 2000 करोड़ रुपये का लोन चाहती है। इस स्कीम में शुरुआती दो साल तक सिर्फ ब्याज देना होता है, मूलधन नहीं। लेकिन क्या सरकार दोबारा मदद करेगी, यह अभी साफ नहीं है।
मार्च तिमाही में नुकसान तय माना जा रहा है। ऊपर से फ्यूल महंगा, यात्रियों की संख्या में गिरावट और प्रतिस्पर्धी कंपनियों की आक्रामक रणनीति। एक्सपर्ट मानते हैं कि अब सिर्फ दो रास्ते बचे हैं- सरकार से नई मदद या प्रमोटर अपनी हिस्सेदारी बेच दें।