Chip Tariff: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन सेमीकंडक्टर यानी इलेक्ट्रॉनिक चिप्स पर नए टैरिफ लगाने पर विचार कर रहा है। पॉलिटिको की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रस्ताव के तहत सिर्फ चिप्स ही नहीं, बल्कि उनसे बनने वाले मोबाइल, लैपटॉप, कार और AI डेटा सेंटर में इस्तेमाल होने वाले सर्वर जैसे कई टेक प्रोडक्ट्स भी टैरिफ के दायरे में आ सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक ऐसी व्यवस्था के पक्ष में हैं, जिसमें विदेशी कंपनियों को टैरिफ से राहत तभी मिले, जब वे अमेरिका में चिप मैन्युफैक्चरिंग में निवेश करें। वहीं, टेक कंपनियों ने चेतावनी दी है कि इस तरह के टैरिफ से AI के क्षेत्र में अमेरिका की बढ़त को नुकसान पहुंच सकता है। हालांकि, अभी यह सिर्फ प्रस्ताव है। टैरिफ कितना होगा, किन चिप्स और देशों पर लागू होगा और किसे छूट मिलेगी, यह अभी तय नहीं है।
टैरिफ का आसान मतलब है विदेश से आने वाले सामान पर लगाया जाने वाला टैक्स। ताइवान, दक्षिण कोरिया, जापान और दूसरे एशियाई देशों की चिप कंपनियों के लिए अमेरिका बहुत बड़ा बाजार है। अगर नई ड्यूटी बड़े स्तर पर लागू होती है तो उनके प्रोडक्ट अमेरिकी ग्राहकों के लिए महंगे हो सकते हैं। ऐसे में कंपनियों की लागत बढ़ जाएगी। कंपनियां या तो इस बढ़ी लागत को खुद सहेंगी, जिससे उनका मुनाफा घट सकता है, या फिर ग्राहकों तक इसका बोझ पहुंचा सकती हैं।
अगर नए टैरिफ का दायरा सामान्य प्रोसेसर, मेमोरी चिप्स और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स तक बढ़ता है तो मोबाइल, लैपटॉप, गेमिंग डिवाइस और कार बनाने की लागत बढ़ सकती है। लेकिन इसका असर जल्दी नहीं दिखेगा क्योंकि कंपनियों के पास पहले से खरीदा हुआ स्टॉक है। इसलिए असर धीरे-धीरे नए ऑर्डर और नए मॉडल की कीमतों में दिख सकता है।
AI कंपनियां एडवांस चिप्स और डेटा सेंटर पर भारी खर्च कर रही हैं। अगर इन चिप्स पर टैरिफ बढ़ा और छूट सीमित रही तो डेटा सेंटर बनाने की लागत बढ़ सकती है। इससे Microsoft, Amazon, Google जैसी बड़ी टेक कंपनियों के निवेश बजट पर दबाव पड़ सकता है।
भारत पर इसका सीधा असर सीमित है, लेकिन इनडायरेक्ट असर हो सकता है। ग्लोबल चिप्स महंगी होने पर भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटो कंपनियों की कंपोनेंट लागत बढ़ सकती है। इसका असर आगे चलकर कुछ प्रोडक्ट्स की कीमतों पर भी पड़ सकता है। हालांकि, लंबे समय में भारत के लिए मौका भी बन सकता है। अगर ग्लोबल कंपनियां एक ही देश पर निर्भरता कम करना चाहें तो भारत में चिप डिजाइन, असेंबली, टेस्टिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में निवेश बढ़ सकता है।