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ट्रंप की ‘टैरिफ डिप्लोमेसी’: रूस से दूर कर क्या भारत को चीन का विकल्प बनाना चाहता है अमेरिका

India-US Economic Ties: ट्रंप प्रशासन ने भारत को रूसी तेल के बदले 25% टैरिफ हटाने का बड़ा ऑफर दिया है। इस मास्टरप्लान के जरिए अमेरिका भारत को चीन के विकल्प के रूप में खड़ा करना चाहता है।

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Jan 24, 2026
चीन के बजाय भारत से नजदीकी चाहता है अमेरिका। ( फोटो: AI Generated )

Geopolitical Shift: दुनिया की दो बड़ी महाशक्तियों के बीच भारत एक बार फिर कूटनीति के केंद्र में है। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के करीबियों से छन कर आ रही खबरें संकेत दे रही हैं कि अमेरिका, भारत को एक बड़ा 'ऑफर' (US India Trade Deal) देने की तैयारी में है। रणनीति साफ है: यदि भारत रूस से तेल (Russian Oil Import) का मोह छोड़ता है, तो अमेरिका न केवल 25% टैरिफ हटाएगा, बल्कि भारत को 'अगला चीन' (Global Manufacturing Hub) बनाने में पूरी मदद करेगा।

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ट्रंप का 'ग्रैंड प्लान': रूस को कमजोर, भारत को मजबूत करना

ट्रंप प्रशासन (Trump Administration) की सोच इस बार केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। अमेरिका जानता है कि रूस की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा तेल निर्यात पर टिका हुआ है। यदि भारत जैसा बड़ा खरीदार हाथ खींच लेता है, तो रूस आर्थिक रूप से अलग-थलग पड़ जाएगा। इसके बदले में अमेरिका भारत को वह जगह देने का लालच दे रहा है, जो पिछले तीन दशकों से चीन के पास थी। 25% टैरिफ हटाने का संकेत इसी दिशा में पहला कदम माना जा रहा है।

चीन का विकल्प बनने की राह में 'टैरिफ' का रोड़ा (China Alternative)

वर्तमान में, अमेरिका और चीन के बीच चल रहे ट्रेड वॉर का सीधा फायदा भारत को मिल सकता है। अमेरिकी कंपनियां अपनी सप्लाई चेन चीन से हटाकर किसी विश्वसनीय लोकतांत्रिक देश में ले जाना चाहती हैं। लेकिन, भारत पर लगे भारी आयात शुल्क (टैरिफ) इस रास्ते में बाधा थे। ट्रंप प्रशासन का यह ताजा 'हिंट' बताता है कि वे भारत के लिए अपने बाजार खोलकर चीन की आर्थिक बादशाहत को सीधी चुनौती देना चाहते हैं।

तेल का खेल और भारत की दुविधा

भारत के लिए यह सौदा जितना आकर्षक है, उतना ही पेचीदा भी। रूस ने मुश्किल समय में भारत को सस्ता तेल देकर महंगाई पर लगाम लगाने में मदद की है। वहीं, अमेरिका का साथ मिलने से भारत का निर्यात (खासकर स्टील, फार्मा और आईटी सेक्टर) रॉकेट की रफ्तार पकड़ सकता है। सवाल यह है कि क्या भारत अपने पुराने दोस्त (रूस) को छोड़कर नई ऊंचाइयों (अमेरिकी बाजार) की ओर कदम बढ़ाएगा?

'चेक एंड मेट' की बिसात

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह "भू-राजनीतिक सौदेबाजी" है। अमेरिका भारत को चीन के खिलाफ एक मजबूत ढाल की तरह इस्तेमाल करना चाहता है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भारत इस प्रस्ताव को स्वीकार करता है, तो अमेरिका के साथ रक्षा और तकनीक के क्षेत्र में सहयोग ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच जाएगा, जिससे दक्षिण एशिया में भारत का कद चीन से भी ऊंचा हो सकता है।

अब गेंद भारत के पाले में

आने वाले दिनों में हमें इन तीन बिंदुओं पर नजर रखनी होगी:

वाणिज्यिक वार्ता: क्या भारत अमेरिका से तेल आपूर्ति की गारंटी मांगेगा?

ब्रिक्स (BRICS) पर असर: रूस के साथ संबंधों में बदलाव का असर भारत के ब्रिक्स जैसे संगठनों में प्रभाव पर क्या पड़ेगा?

अमेरिकी कंपनियों का रुख

क्या एप्पल और टेस्ला जैसी कंपनियां अपनी मैन्युफैक्चरिंग का बड़ा हिस्सा भारत शिफ्ट करने के आधिकारिक वादे करेंगी?

मिडिल ईस्ट का नया समीकरण

इस पूरे मामले का एक छिपा हुआ पहलू खाड़ी देश (Middle East) हैं। अगर भारत रूस से तेल कम करता है, तो उसे सऊदी अरब और यूएई पर निर्भरता बढ़ानी होगी। अमेरिका इन देशों के साथ भी भारत के रिश्ते मजबूत करवाकर एक ऐसा 'कॉरिडोर' बनाना चाहता है, जो चीन के 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) को पूरी तरह फेल कर दे। यानी यह जंग सिर्फ टैरिफ की नहीं, बल्कि वैश्विक रास्तों पर कब्जे की भी है।

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