
UPI Transaction Charges: क्या आने वाले समय में UPI से पेमेंट करना पहले जैसा पूरी तरह फ्री नहीं रहेगा? यह सवाल इस समय काफी लोगों को परेशान कर रहा है। फिलहाल ऐसा नहीं हुआ है, लेकिन इसकी कानूनी तैयारी जरूर शुरू हो गई है। लोकसभा ने बुधवार, 6 अगस्त को एक अहम संशोधन बिल पास कर दिया, जिससे सरकार को भविष्य में UPI और RuPay जैसे डिजिटल पेमेंट पर जीरो-MDR व्यवस्था में बदलाव करने का अधिकार मिल जाएगा। यहां एमडीआर का मतलब मर्चेंट डिस्काउंट रेट से है।
यह बिल विपक्ष के हंगामे के बीच बिना चर्चा के पास हुआ। सरकार का कहना है कि इसका मकसद डिजिटल पेमेंट सिस्टम को लंबे समय तक मजबूत और टिकाऊ बनाना है, ताकि बैंक और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स के लिए भी कमाई का एक स्थायी मॉडल तैयार हो सके।
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि इस बिल के पास होने का मतलब यह नहीं है कि यूपीआई इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों से तुरंत कोई शुल्क लिया जाएगा। अभी भी आम लोगों के लिए यूपीआई ट्रांजैक्शन पहले की तरह मुफ्त रहेंगे। हालांकि, अब सरकार को कानूनी अधिकार मिल जाएगा कि वह अधिसूचना जारी कर तय कर सके कि किन डिजिटल पेमेंट माध्यमों या किस तरह के ट्रांजैक्शन पर शुल्क नहीं लगेगा और किन पर नियम बदले जा सकते हैं।
MDR यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट वह शुल्क होता है, जो दुकानदार या व्यापारी डिजिटल पेमेंट स्वीकार करने पर बैंक या पेमेंट सर्विस देने वाली कंपनी को देते हैं। अभी यूपीआई और रुपे डेबिट कार्ड से होने वाले पेमेंट पर जीरो-एमडीआर लागू है। यानी बैंक और पेमेंट सिस्टम प्रोवाइडर इन ट्रांजैक्शन पर सीधे या परोक्ष रूप से कोई शुल्क नहीं ले सकते। इसके उलट RTGS और NEFT जैसे बैंकिंग माध्यमों में पहले से ही कुछ मामलों में सेवा शुल्क लिया जाता है।
टैक्सेशन एंड अदर लॉज (अमेंडमेंट) बिल, 2026 में पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007, इनकम टैक्स एक्ट, 2025 और फाइनेंस एक्ट, 2026 में संशोधन किए गए हैं। सबसे अहम बदलाव यह है कि पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट और इनकम टैक्स एक्ट के बीच मौजूद कानूनी लिंक को हटाने का प्रस्ताव रखा गया है। इसके बाद सरकार भविष्य में UPI और RuPay पर लागू जीरो-MDR व्यवस्था में बदलाव करने का फैसला आसानी से कर सकेगी। हालांकि, बिल में कहीं भी यह नहीं लिखा गया है कि एमडीआर कितना होगा या कब से लागू होगा। केवल सरकार को भविष्य में जरूरत पड़ने पर नियम बदलने का अधिकार दिया गया है।
अगर भविष्य में सरकार कुछ यूपीआई ट्रांजैक्शन पर मर्चेंट चार्ज लागू करती है, तो सबसे पहले असर व्यापारियों पर पड़ सकता है। उनकी डिजिटल पेमेंट स्वीकार करने की लागत बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में कुछ कारोबारी अतिरिक्त खर्च ग्राहकों पर डाल सकते हैं या फिर अपनी कीमतों में बदलाव कर सकते हैं। हालांकि, यह पूरी तरह सरकार की भविष्य की नीति पर निर्भर करेगा।
सरकार का कहना है कि डिजिटल पेमेंट का दायरा लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में बैंक और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स के लिए भी एक टिकाऊ रेवेन्यू मॉडल होना जरूरी है। इससे डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम को मजबूत बनाए रखने में मदद मिलेगी। सरकार का यह भी कहना है कि इन बदलावों से भारत वैश्विक निवेश, मैन्युफैक्चरिंग और कारोबार के लिए अधिक भरोसेमंद और आकर्षक बाजार बन सकेगा।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने विपक्ष के आरोपों पर सफाई देते हुए कहा, 'अफवाह फैलाने से पहले इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि एमडीआर केवल मर्चेंट्स पर लागू होता है, यूजर्स या ग्राहकों पर नहीं। अभी NPCI की अगुवाई वाली यूपीआई एंड सर्विसेज स्टीयरिंग कमिटी ने एमडीआर पर फैसला भी नहीं किया है। संसद से संशोधन विधेयक पास होने के बाद ही इस बारे में कोई फैसला होगा।'
यह बिल 5 जून को लाए गए अध्यादेश की जगह लेगा। इसके तहत विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) को सरकारी प्रतिभूतियों (G-Secs) में निवेश से होने वाली ब्याज आय और कैपिटल गेन पर आयकर छूट देने का भी प्रावधान किया गया है। इससे विदेशी निवेश को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।