चेन्नई

दूध के साथ शरीर में जा रहा एंटीबायोटिक!

Center for Science and Environment सीएसई का अध्ययन : अगर कोई डेयरी किसान अपने मवेशियों को एंटीबायोटिक देता है तो इसके मानव शरीर में पहुंचने की आशंका रहती है। बेवजह एंटीबायोटिक का उपयोग रोग ठीक करने की इसकी क्षमता को बेअसर कर देता है। पशुपालकों को विथड्रॉल पीरियड की नहीं है जानकारी।
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Jun 26, 2020
दूध के साथ शरीर में जा रहा एंटीबायोटिक!
दूध के साथ शरीर में जा रहा एंटीबायोटिक!

पी. एस. विजयराघवन

चेन्नई. दूध का कारोबार करने वाले किसान आमदनी बढ़ाने के लिए फसलों के साथ ही मवेशियों में भी एंटीबायोटिक का उपयोग ज्यादा करने लगे हैं जो चिंताजनक है। सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट (सीएसई) (Center for Science and Environment) का अध्ययन कहता है कि अगर कोई डेयरी किसान अपने मवेशियों को एंटीबायोटिक देता है तो इसके मानव शरीर में पहुंचने की आशंका रहती है। बेवजह एंटीबायोटिक (Antibiotic) का उपयोग रोग ठीक करने की इसकी क्षमता को बेअसर कर देता है।

इस अध्ययन से जुड़े सीएसई की राजेश्वरी सिन्हा, दिव्या खट्टर और अमित खुराना के अनुसार देश के पशुपालकों की आमदनी का जरिया दूध बेचना है। पशुओं को स्वस्थ रखने के उद्देश्य से वे एंटीबायोटिक का उपयोग करते हैं जबकि उनको यह मालूम नहीं है कि इसका मानव शरीर पर कितना घातक असर पड़ सकता है। सीएसई ने जिन किसानों से बात उनमें से अधिकांश को विथड्रॉल पीरियड की जानकारी नहीं थी। यह एंटीबायोटिक के अंतिम इस्तेमाल और दूध बेचने से पहले की अवधि (७ से १५ दिन) होती है। किसानों को इस अवधि में दूध कभी नहीं बेचना चाहिए इसका नतीजा एंटीबायोटिक रेसिस्टेंस के रूप में सामने आता है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने 2018 में देशभर के संगठित और असंगठित क्षेत्र के दूध के नमूनों की जांच की थी। जांचे गए 77 नमूनों में एंटीबायोटिक के अवशेष स्वीकार्य सीमा से अधिक पाए थे।

सर्वे में यह सामने आया है कि पशुओं में अमूमन होने वाले थनैला रोग से किसान परेशान रहते हैं। दवाखानों के चक्कर काटने के बजाय आमतौर पर इस बीमारी का इलाज खुद ही करते हैं इस वजह से ऐसी एंटीबायोटिक का उपयोग कर बैठते हैं जिनके दुष्परिणाम सामने आते हैं।

पेनिसिलिन, जेंटामाइसिन, स्ट्रेप्टोमाइसिन और एनरोफ्लोसेसिन

सेफ्टीओफर, अमोक्सीसिलिन, क्लोक्सासिलिन और सेफ्ट्रीएक्सोन-सलबैक्टम

फैक्ट फाइल

उपाय

90 तरह की जांच

तमिलनाडु दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ (आविन) में उपभोक्ताओं तक दूध की सुपुर्दगी से पहले विभिन्न स्तरों पर ९० तरह की जांच होती है। आविन केवल सोसायटी के सदस्यों से दूध की खरीद करता है। क्लीन मिल्क प्रॉडक्शन नीति के तहत पशुपालकों को मवेशियों के रखरखाव तथा दूध दुहने की पूरी तालीम दी जाती है। उनकी भी पशु चिकित्सकों व विशेषज्ञों द्वारा आवधिक जांच होती है। दूध उत्पादकों से क्लस्टर, सोसायटी और अंत में आविन की डेयरी तक सैम्पल के विभिन्न जांच होते हैं। आविन का दूध शिशुओं को भी दिया जा सकता है।
वी. वासु, पूर्व जनसंपर्क अधिकारी, आविन

Published on:
26 Jun 2020 12:47 am