छतरपुर

डिप्रेशन का शिकार होकर घर वालों से बिछड़ गई थी बैंगलोर की अनुराधा, छतरपुर की संस्था ने 3 साल बाद मिलाया

Nirvana Foundation : मानवता की मिसाल बनी छतरपुर की संस्था। डिप्रेशन के अंधेरे में अपनों से बिछड़ी बैंगलोर की अनुराधा को निर्वाना फाउंडेशन में मिला नया जीवन। 3 साल बाद जब भाई ने माथे पर हाथ रखा तो छलक पड़े खुशी के आंसू। विदाई के समय रो पड़ा पूरा आश्रम, ठीक होने के बाद बच्चों की टीचर दीदी बन चुकी थीं अनुराधा।
3 min read
Nirvana Foundation
मानवता की मिसाल बनी छतरपुर की संस्था (Photo Source- Input)

Chhatarpur News : कहते हैं कि, अगर इंसानियत जिंदा हो तो पराई दीवारें भी मायका बन जाती हैं और अजनबी लोग भी सगे माता-पिता सा फर्ज निभा जाते हैं। कुछ ऐसा ही भावुक कर देने वाला माजरा मध्य प्रदेश के छतरपुर में देखने को मिला, जहां निर्वाना फाउंडेशन ने सेवा, समर्पण और नि:स्वार्थ प्रेम की एक ऐसी अनूठी इबारत लिखी है, जिसकी गूंज अब सात समंदर पार न सही, लेकिन दो हजार किलोमीटर दूर कर्नाटक की राजधानी बैंगलोर तक पहुंच गई है।

मानसिक अवसाद (डिप्रेशन) के काले साए में भटककर करीब तीन साल पहले छतरपुर की सड़कों पर बदहवास घूमने वाली 40 वर्षीय अनुराधा शेट्टी आखिरकार अपने असली परिवार से मिल गईं। जब भाई ने इतने सालों बाद अपनी बहन को सही-सलामत देखा, तो दोनों एक-दूसरे के गले लगकर फफक-फफक कर रो पड़े। आश्रम का माहौल ऐसा था, मानो किसी बेटी की डोली विदा हो रही हो।

अकेलेपन और टीवी की लत ने छीना था सुध-बुध

निर्वाना फाउंडेशन के संचालक संजय सिंह ने अनुराधा के मिलने के उन शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया कि, लगभग 3 साल पहले जब अनुराधा पहली बार संस्था के सदस्यों को मिली थीं, तब उनकी मानसिक स्थिति बेहद दयनीय थी। वो न तो अपना नाम ठीक से बता पा रही थीं और न ही ये कि वो कहां से आई हैं। दरअसल, बैंगलोर में रहने के दौरान वो लगातार टीवी देखने और अत्यधिक अकेलेपन के कारण गहरे डिप्रेशन का शिकार हो गई थीं। मानसिक संतुलन खोने के बाद वे कब, कैसे और किन ट्रेनों से बदलकर बैंगलोर से सीधे छतरपुर पहुंच गईं, यह आज भी एक रहस्य है।

संस्था ने पहले मां-बाप बनकर दी दवा, फिर अनुराधा बनीं अनाथ बच्चों का सहारा

फाउंडेशन में लाने के बाद शुरू के कुछ महीने बेहद चुनौतीपूर्ण थे। लेकिन संस्था के सदस्यों ने हार नहीं मानी। उन्होंने अनुराधा को सिर्फ एक मरीज नहीं, बल्कि अपने घर की बेटी माना। लगभग एक वर्ष तक उन्हें भरपूर सेवा, पारिवारिक अपनापन, सम्मान और उचित चिकित्सीय उपचार दिया गया। इस निश्छल प्रेम और सही इलाज का ऐसा चमत्कारी असर हुआ कि अनुराधा के दिमाग पर छाया डिप्रेशन का कोहरा धीरे-धीरे छटने लगा।

दिलचस्प बात ये है कि, पिछले दो सालों से पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद अनुराधा ने खुद को आश्रम के लिए समर्पित कर दिया था। वो संस्था की एक मजबूत रीढ़ बन गईं। आश्रम के अनाथ और बेसहारा बच्चों के लिए वो अनुराधा दीदी बन गईं, जो सुबह उठने से लेकर उन्हें पढ़ाने-लिखाने और उनकी देखभाल करने की पूरी जिम्मेदारी बेहद प्यार से संभालती थीं।

स्मृति की धुंधली परतों से निकले नंबर और मुकम्मल हुई तलाश

मानवता की मिसाल बनी छतरपुर की संस्था (Photo Source- Input)

अनुराधा के परिवार को खोजने की दास्तान भी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। पिछले महीने जब अनुराधा पूरी तरह मानसिक रूप से स्वस्थ महसूस कर रही थीं, तो अचानक एक दिन उनकी स्मृति की धुंधली परतों से कुछ पुराने मोबाइल नंबर निकल आए। उन्होंने बेहद हिचकिचाते हुए संस्था के पदाधिकारियों को वे नंबर नोट कराए। संस्था ने जब बिना वक्त गंवाए उन नंबरों पर डायल किया, तो दूसरी तरफ घंटी बजने के साथ ही उम्मीदों की एक नई किरण जागी। इतने वर्षों तक अनुराधा का कोई सुराग न मिलने के कारण जो परिवार अंदर से टूट चुका था और अपनी बेटी को मृत मानकर आस छोड़ चुका था, वे इस फोन कॉल को पाकर सन्न रह गए। तुरंत वीडियो कॉल की गई और जब स्क्रीन पर सालों बाद बहन का चेहरा चमका, तो बैंगलोर में बैठा पूरा परिवार रो पड़ा।

शायद मेरी किस्मत मुझे इन भगवान जैसे लोगों के पास लाई थी

बुधवार को जब विदाई की बेला आई, तो अनुराधा की आंखें छतरपुर के उस आशियाने को छोड़कर जाने में नम थीं, जिसने उन्हें नया जीवन दिया था। उन्होंने रुंधे गले से कहा शायद मेरी किस्मत में ही भटककर यहां बुंदेलखंड आना लिखा था। अगर मुझे यह संस्था और यहां के लोग न मिलते, तो शायद मैं किसी सड़क किनारे दम तोड़ देती। यहां के लोगों ने मेरे दूसरे माता-पिता बनकर मेरा पालन-पोषण किया और मुझे इस काबिल बनाया। अब मैं भगवान से यही मन्नत मांगूंगी कि मेरे जैसे जितने भी दुनिया में परेशान लोग हैं, उन्हें ऐसा ही सच्चा सहारा मिले। 2000 किमी दूर से आए भाई ने कहा: बहन की सुरक्षा का डर था, पर यहां वह गरिमा के साथ रही है।

Updated on:
21 May 2026 06:47 am
Published on:
21 May 2026 06:47 am
Also Read
View All
2026 की जनगणना रिपोर्ट ने उड़ाए होश; करोड़ों खर्च के बाद भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे ग्रामीण! कागजों पर 2019 में ही शौच मुक्त हुआ छतरपुर, पर हकीकत अगल

तारीफ के काबिल जिला अस्पताल का प्रयास जहां सिर्फ 23 फीसदी सिजेरियन, पर सवाल यह कि प्राइवेट नर्सिंग होम में कदम रखते ही यह आंकड़ा 62 प्रतिशत के पार क्यों?

छतरपुर में यातायात पुलिस की मुहिम लाई रंग: 6 महीनों में सड़क हादसों और मौतों में आई 30% की बड़ी कमी, सुधारे गए ब्लैक स्पॉट्स

फंदे पर लटकी मिली छतरपुर की लेडी कलाकार, आखिरी बार साथी से 38 मिनट की वीडियो कॉल

9वीं व 11वीं की किताबों का टोटा, एआई विषय तो जोड़ा पर सिलेबस गायब; निजी प्रकाशकों की चांदी, अभिभावकों पर बढ़ा आर्थिक बोझ