MP News: 6 करोड़ साल पुराने वनस्पति जीवाश्मों के कारण अंतरराष्ट्रीय शोध का केंद्र बन गया है। विदेशी विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिक यहां पहुंच रहे हैं।
MP News: धरती की परतों में छिपा 6 करोड़ साल पुराना इतिहास अब वैज्ञानिकों के लिए बड़ा आकर्षण बन गया है। यहां मिले दुर्लभ वनस्पति जीवाश्मों ने देश-विदेश के शोधकर्ताओं का ध्यान खींचा है। विदेशी विश्वविद्यालयों की टीमें लगातार फील्ड स्टडी कर रही हैं। यह जगह मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में स्थित है। जिले की चौरई तहसील का मोहगांव कला गांव करोड़ों साल पुराने वनस्पति जीवाश्मों का ऐसा खजाना समेटे है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोध का केंद्र बन चुका है।
4.5 से 6 करोड़ साल पुराने इन जीवाश्मों (60 million year old fossils) ने मध्य भारत को वैश्विक वैज्ञानिक नक्शे पर पहचान दिलाई है, लेकिन अब तक इस स्थल को संरक्षित जियो-हेरिटेज साइट का दर्जा नहीं मिल पाया है। शोध के दौरान यहां मिले वनस्पति जीवाश्मों की उम्र की पुष्टि अमरीका के कोलोराडो विवि में कार्बन डेटिंग परीक्षण से हो चुकी है। महाराष्ट्र के भंडारा निवासी वनस्पति वैज्ञानिक प्रो. दशरथ कापगते ने 1980 से लगातार मोहगांव कला में शोध करते हुए 200 से अधिक जीवाश्म एकत्रित किए है। उनके कार्य ने इस क्षेत्र को मध्य भारत के जीवाश्म अध्ययन का प्रमुख केंद्र बना दिया है।
प्रो. कापगते, जो पहले जेएम पटेल कॉलेज भंडारा में प्रोफेसर रहे और वर्तमान में अमरीका की फ्लोरिडा विवि में मानद प्राध्यापक है। उनके मार्गदर्शन में 14 शोधार्थियों ने मध्य भारत के जीवाश्मों पर पीएचडी की है। महाराष्ट्र, मप्र और अमरीका के छात्र नियमित रूप से मोहगांव पहुंचकर अध्ययन करते हैं। अमरीका के चार विश्वविद्यालयों के शोधकर्ता भी यहां फील्ड स्टडी के लिए आते रहे हैं। शोध के दौरान चौरई, मंडला, सिवनी और बैतूल से एकत्रित 188 जीवाश्म नमूने और 400 से अधिक माइक्रो स्लाइड्स को यूनिवर्सिटी ऑफ फ्लोरिडा के संग्रहालय में रखा गया है, जहां अध्ययन जारी है।
प्रो कापगते का कहना है, प्रदेश में जीवाश्म संपदा होने के बावजूद यहां किसी विवि में पुरा-वनस्पति विज्ञान की पढ़ाई नहीं होती। यदि विषय को अकादमिक पाठ्यक्रम और स्थानीय संग्रहालय से जोड़ा जाए तो यह क्षेत्र शिक्षा और वैज्ञानिक पर्यटन का बड़ा केंद्र बन सकता है।
प्रो दशरथ कापगते बताते है कि प्रोफेसर बीरबल साहनी, जिन्हें भारतीय पुरा-वनस्पति विज्ञान का जनक माना जाता है। प्रो. साहनी ने छिंदवाड़ा और उसके आसपास के क्षेत्रों में पाई जाने वाली डेक्कन इंटरट्रैपियन चट्टानों से पौधों के जीवाश्म का व्यापक अध्ययन किया था। प्रो. साहनी द्वारा एकत्रित वनस्पति जीवाश्म, जो छिंदवाड़ा और मप्र के अन्य क्षेत्रों से पुराविज्ञान संस्थान में रखे हुए हैं। प्राप्त हुए थे, आज भी बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान में रखे हुए है। (MP News)