
Chitrakoot Nirmohi Akhara: चित्रकूट की धर्मनगरी में इस बार आई बाढ़ अपने पीछे सिर्फ पानी और कीचड़ नहीं छोड़ गई, बल्कि रामघाट स्थित 114 साल पुराने निर्मोही अखाड़े की मुश्किलें भी बढ़ा गईं। पानी उतरने के बाद प्रसादालय भवन की दीवारों में जगह-जगह दरारें दिखाई दे रही हैं। संतों को अब डर है कि कमजोर हो चुका भवन कहीं और क्षतिग्रस्त न हो जाए।
अखाड़े के संतों का कहना है कि नदी की तरफ लगातार हो रहे कटान का खतरा नया नहीं है। करीब चार साल से इसकी जानकारी प्रशासन और संबंधित विभागों को दी जा रही है। नवंबर 2025 में भी अधिकारियों को पत्र देकर कटान रोकने और अखाड़े की सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठाने की मांग की गई थी। संतों के मुताबिक, भवन के निर्माण और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी कई बार पत्राचार हुआ, लेकिन स्थायी समाधान नहीं हो सका।
अखाड़े से जुड़े महंत प्रमुख दीन दयाल जी महाराज के मुताबिक, अधिकारियों को पहले ही संभावित खतरे से अवगत कराया गया था। उनका आरोप है कि शिकायतों और पत्रों के बावजूद मौके पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। अब बाढ़ का पानी उतरने के बाद प्रसादालय की दीवारों में आई दरारों ने चिंता और बढ़ा दी है। संतों के सामने सबसे बड़ी चिंता भवन में रहने और आने-जाने वाले लोगों की सुरक्षा को लेकर है। उनका कहना है कि यदि समय रहते मरम्मत और सुरक्षा के इंतजाम नहीं हुए तो नुकसान और बढ़ सकता है।
निर्मोही अखाड़े की पहचान केवल उसकी धार्मिक परंपराओं से नहीं, बल्कि यहां चलने वाली निशुल्क अन्न सेवा से भी जुड़ी है। प्रसादालय में पिछले 114 वर्षों से संतों और श्रद्धालुओं को भोजन एवं प्रसाद कराया जाता रहा है। सामान्य दिनों में यहां करीब एक हजार लोगों के भोजन की व्यवस्था होती थी। सेवा को लगातार चलाने के लिए करीब चार महीने की खाद्य सामग्री परिसर में रखी गई थी। लेकिन बाढ़ का पानी अंदर पहुंचा तो बड़ी मात्रा में राशन खराब हो गया। महंत के अनुसार, करीब 50 क्विंटल आटा, 10 क्विंटल चावल और 100 लीटर तेल-घी समेत दूसरी खाद्य सामग्री पानी की चपेट में आ गई। भोजन तैयार करने वाले बर्तन और अन्य सामान को भी नुकसान पहुंचा। इसके चलते वर्षों से चली आ रही अन्न सेवा फिलहाल रोकनी पड़ी है।
बाढ़ ने संतों की रहने की व्यवस्था को भी प्रभावित किया है। महंत मुन्ना शास्त्री के मुताबिक, संतों के बिस्तर और दूसरे जरूरी सामान पानी में खराब हो गए। पानी कम होने के बाद संत दिनभर परिसर की सफाई और सामान को सुरक्षित जगह पहुंचाने में लगे हैं। रात गुजारने के लिए उन्हें फिलहाल दूसरे स्थानों का सहारा लेना पड़ रहा है। अन्न सेवा बंद होने के बाद प्रशासन की ओर से उपलब्ध कराए जा रहे लंच पैकेट से भोजन करना पड़ रहा है। यानी जिस प्रसादालय में वर्षों से दूसरों के लिए भोजन तैयार होता था, वहां अब संतों और श्रद्धालुओं को खुद राहत सामग्री के भरोसे रहना पड़ रहा है।
इन तमाम मुश्किलों के बीच निर्मोही अखाड़े की सबसे पुरानी धार्मिक परंपरा अब भी जारी है। यहां पिछले 114 वर्षों से अखंड राम नाम का पाठ चल रहा है। बाढ़ का पानी परिसर में पहुंचा, भवन को नुकसान हुआ, राशन खराब हो गया और संतों की रहने की व्यवस्था बदलनी पड़ी, लेकिन राम नाम का क्रम नहीं टूटा। संत विपरीत परिस्थितियों में भी अखंड राम नाम का पाठ जारी रखे हुए हैं। यही इस समय निर्मोही अखाड़े की सबसे बड़ी तस्वीर है, एक तरफ ऐतिहासिक भवन और अन्न सेवा को बचाने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ 114 साल पुरानी आस्था और परंपरा को हर हाल में जारी रखने का संकल्प। अब संतों की मांग है कि बाढ़ के बाद हुए नुकसान का आकलन कर प्रशासन नदी कटान रोकने और अखाड़े की सुरक्षा के लिए स्थायी इंतजाम करे, ताकि अगली बाढ़ फिर वही संकट लेकर न लौटे।