चित्तौड़गढ़

एक ही गांव, एक ही बिरादरी… चित्तौड़गढ़ के वार्ड 34 में ‘प्रधान बनाम प्रधान’ की अनोखी जंग, धर्मसंकट में मतदाता

Chittorgarh Zila Parishad Election: चित्तौड़गढ़ के जिला परिषद वार्ड 34 में भाजपा की छोटू कंवर और कांग्रेस की लक्ष्मी कंवर आमने-सामने हैं। दोनों प्रत्याशी एक ही गांव और बिरादरी से हैं। ऐसे में यह चुनावी मुकाबला चर्चा का विषय बना हुआ है।
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Updated: 2 Nov 2026, 3:48 PM IST
Chittorgarh Zila Parishad Election
भाजपा प्रत्याशी छोटी कुंवर और कांग्रेस प्रत्याशी लक्ष्मीकंवर (Photo-Patrika)

चित्तौड़गढ़. लोकतंत्र के चुनावी अखाड़े में कई बार ऐसे दिलचस्प संयोग बन जाते हैं, जो किसी फिल्मी पटकथा को भी मात दे दें। मेवाड़ की सियासत में इन दिनों एक ऐसा ही सुपर-हॉट और दुर्लभ मुकाबला चर्चा के केंद्र में है। जिला परिषद के वार्ड नंबर 34 के चुनावी रण ने ऐसा सियासी दंगल खड़ा कर दिया है, जिसकी गूंज गंगरार क्षेत्र की हर चौपाल और चाय की दुकान पर सुनाई दे रही है। यह मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच टक्कर का तो है ही, साथ ही यह एक ही गांव के राणावत परिवार के दो दिग्गज परिवारों के बीच 'प्रधान बनाम प्रधान' का बन गया है। इस वार्ड में मंजे हुए राजनीतिक विश्लेषक भी सटीक परिणाम क्या होंगे, इसका अनुमान नहीं लगा पा रहे है। वार्ड नंबर 34 के पूरे चुनावी परिदृश्य में अभी चौगावड़ी गांव चर्चा के केंद्र में है। दोनों ही प्रमुख दलों ने जब एक ही गांव के दो दिग्गजों को टिकट देकर चुनावी मैदान में उतारा है, तो इससे सियासत का पारा चढ़ गया है। दोनों ही दिग्गजों के लिए अपनी राजनीतिक साख बचाना एक बड़ी चुनौती बन गया है। राजनीति में एक-दूसरे के बिल्कुल समकक्ष खड़े इन दोनों परिवारों के लिए यह चुनाव जीतना आगे के सफर के लिए भी कड़ा आपसी संघर्ष साबित होने वाला है।

भाजपा प्रत्याशी

मैदान में उतरीं छोटू कंवर के पति देवीसिंह राणावत भाजपा के जिला महामंत्री है। खास बात यह है कि देवीसिंह की माताजी रूप कंवर पूर्व में गंगरार की प्रधान रह चुकी हैं, यानी इस परिवार में राजनीति की लंबी और मजबूत विरासत है।

कांग्रेस प्रत्याशी

युवा कांग्रेस के जिला अध्यक्ष रविंद्र सिंह राणावत की माता लक्ष्मीकंवर मैदान में है, जो खुद निवर्तमान गंगरार प्रधान है। यानी एक तरफ पूर्व प्रधान की विरासत समेटे भाजपा से उनकी बहू ताल ठोक रही है, तो दूसरी तरफ वर्तमान प्रधान स्वयं कांग्रेस के टिकट पर मैदान में है।

सरपंच से परिषद तक की एक जैसी राह

इस मुकाबले का सबसे रोचक पहलू यह भी है कि दोनों ही दिग्गजों की राजनीतिक यात्रा का शुरुआती बिंदु बिल्कुल एक रहा है। देवीसिंह राणावत और रविंद्र सिंह राणावत दोनों ही अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत अपने गांव की चौगावडी पंचायत के सरपंच के रूप में कर चुके हैं। ग्राम पंचायत की दहलीज से राजनीति की एबीसीडी सीखने वाले ये दोनों नेता आज अपने-अपने दलों में मजबूत मुकाम रखते हैं। अब सरपंच से जिला परिषद की इस बड़ी जंग में दोनों पहली बार आमने सामने हैं।

चाय पर चर्चा और मतदाताओं का धर्मसंकट

गंगरार क्षेत्र की इन 12 ग्राम पंचायतों में यह सीट अब केवल जला परिषद का एक वार्ड नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा का सबसे बड़ा रपिसेंटर बन गई है। चौगावड़ी गांव से निकलकर इसकी चर्चा पूरे जले की चौपालों तक पहुंच चुकी है। मतदाताओं के लिए यह किसी धर्मसंकट से कम नहीं है कि वे अपने ही गांव और अपनी बिरादरी के किस लाल को समर्थन दें। गांव की एक चाय की थड़ी पर बैठे बुजुर्ग चौपाल की गर्माहट के बीच कहते हैं वोट किसे दें? दोनों ही हमारे अपने घर के दीये हैं। एक से पार्टी का नाता है, तो दूसरे से पुराना पारिवारिक संबंध। फैसला करना मुश्किल हो गया है कि सिर पर किसका सेहरा बांधें। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस सीट पर दलों के झंडों से ज्यादा व्यक्तिगत संबंधों, पारिवारिक साख व मैदानी पकड़ का असली इम्तिहान होना है।

Updated on:
2 Nov 2026, 3:48 PM IST
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