
निम्बाहेड़ा. पितृपक्ष के बाद अब नवरात्र और दीपावली का त्योहारी सीजन सिर पर है। आम तौर पर इन दिनों बाजारों में चहल-पहल बढ़ जाती है, लेकिन निम्बाहेड़ा के छोटे बाजारों से लेकर मुख्य किराना और फल-सब्जी मंडियों तक इस समय एक अजीब सी माथापच्ची चल रही है।
ग्राहक की जेब में 200 या 500 का नोट है, उसे 20 या 30 रुपए का सामान चाहिए, लेकिन दुकान पर पहुंचते ही सबसे पहला और बड़ा सवाल यही गूंज रहा है भाई साहब, 10 का छुट्टे देना; छुट्टे हैं क्या? त्योहारी सीजन के मुहाने पर खड़े इस दौर में छोटे नोटों और सिक्कों की किल्लत ने रोजमर्रा के लेन-देन को बड़ा सिरदर्द बना दिया है।
आज के समय में डिजिटल भुगतान (यूपीआई) को नकदी का सबसे बड़ा विकल्प माना जाता है, लेकिन निम्बाहेड़ा के स्थानीय बाजारों की जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कहती है।
जब आधिकारिक बैंकिंग व्यवस्था से कोई ठोस समाधान नहीं मिल रहा, तो निम्बाहेड़ा के छोटे व्यापारियों ने खुद ही इसका तोड़ निकाल लिया है। व्यापारी आपस में ही एक-दूसरे को बड़े नोट देकर चिल्लर और छोटे नोटों का जुगाड़ कर रहे हैं। लेकिन यह कोई स्थायी समाधान नहीं है। अब सबसे बड़ा सवाल आने वाले नवरात्र और दीपावली के पीक सीजन को लेकर है।
जब त्योहारी खरीदारी का दौर परवान चढ़ेगा, तब छोटे मूल्यवर्ग की जरूरत सामान्य दिनों के मुकाबले कई गुना बढ़ जाएगी। यदि समय रहते बैंकों और स्थानीय स्तर पर छोटे नोटों की यह किल्लत दूर नहीं की गई, तो आने वाले दिनों में छुट्टा है क्या? सिर्फ एक दुकानदार का सवाल नहीं, बल्कि पूरे बाजार की सबसे बड़ी रुकावट बन जाएगा।
दुकानदारों की परेशानी यह है कि दिनभर की बिक्री में बड़े नोट तो धड़ल्ले से आ रहे हैं और गल्ले में जमा होते जा रहे हैं, लेकिन ग्राहकों को खुले पैसे या खुल्ले लौटाने के लिए 5, 10, 20 और 50 रुपए के नोट या सिक्के ढूंढे नहीं मिल रहे। बाजार की तस्वीर यह है कि एक दुकानदार के पास यदि गलती से सिक्के आ गए, तो आस-पास के दूसरे दुकानदार उससे चिल्लर मांगने पहुंच जाते हैं। यानी बाजार में कुल नकदी तो घूम रही है, लेकिन वह उस छोटे मूल्यवर्ग में नहीं है जिसकी रोजमर्रा के खुदरा कारोबार को सबसे ज्यादा जरूरत होती है।
क्या निम्बाहेड़ा के स्थानीय बैंक त्योहारी सीजन को देखते हुए विशेष काउंटर लगाकर छोटे नोटों और सिक्कों की सुचारु सप्लाई सुनिश्चित करेंगे? निम्बाहेड़ा शहर के व्यापारियों की निगाहें अब इसी व्यवस्था पर टिकी हैं।