चूरू

बुद्धि व ऋद्धि का गर्व भी मोक्ष प्राप्ति में बाधक : आचार्य महाश्रमण

गुप्तदान को महापुण्य की भांति बताया गया है। व्यक्ति को अपने चेहरे की सुंदरता का भी अहंकार नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार तपस्या आदि का भी अहंकार नहीं होना चाहिए।

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Feb 11, 2026

चूरू / लाडनूं. जैन विश्व भारती (Jain Vishwa Bharati) परिसर स्थित सुधर्मा सभा में प्रवचन के दौरान मंगलवार को आचार्य महाश्रमण ने संबोधित करते हुए कि जैन दर्शन में मोक्ष की बात नव तत्त्वों में भी मिलती है। साधना की अंतिम निष्पत्ति भी मोक्ष के रूप में होती है। मोक्षावस्था में आठ कर्मों में से कोई भी कर्म विद्यमान नहीं रहता है। मोक्ष के जीव का न तो शरीर होता है, न मन और न ही वाणी होती है। ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम से ज्ञान की प्राप्ति होती है। ज्ञान की विशेष प्राप्ति भी अहंकार का निमित्त बन सकती है।

ज्ञान व विद्वता होने पर भी मौन रखना बहुत अच्छी बात होती है। दिखावे के लिए ज्ञान का प्रदर्शन करना अहंकार की बात होती है। ज्ञान होने पर भी मौन रख लेना बहुत महत्ता की बात हो सकती है। इसी प्रकार शक्ति व बल होने के बाद भी व्यक्ति को क्षमा भाव रखना चाहिए। शक्ति होने पर भी सहिष्णुता रखना बड़प्पन की बात होती है। दान करने पर भी श्लाघा या ख्याति की आशा नहीं रखना चाहिए। गुप्त तरीके से दान देना बहुत बड़ा पुण्य है। दान देने में भी नाम की भावना नहीं हो तो भी बहुत अच्छी बात हो सकती है।

तपस्या आत्मा के कल्याण के लिए की जाती है
गुप्तदान को महापुण्य की भांति बताया गया है। व्यक्ति को अपने चेहरे की सुंदरता का भी अहंकार नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार तपस्या आदि का भी अहंकार नहीं होना चाहिए। तपस्या आत्मा के कल्याण के लिए की जाती है, इसलिए तपस्या का अहंकार भी नहीं होना चाहिए। लाभ आदि विभिन्न बातों का भी अहंकार नहीं करना चाहिए। अहंकार व प्रदर्शन से बचने का प्रयास करना चाहिए।

अपना काम स्वयं करने का प्रयास करें
उन्होंने बताया कि इसलिए शास्त्र में कहा गया कि मति, बुद्धि और ऋद्धि का गर्व मोक्ष प्राप्ति में बाधक है। फालतू चुगलखोरी करना भी बुरी बात है। किसी भी कार्य में सफलता पाने के लिए परिश्रम एकमात्र सूत्र है। व्यक्ति को परिश्रमशील होना चाहिए और जहां तक संभव हो, अपना काम स्वयं करने का प्रयास करना चाहिए। दूसरों पर कार्य न छोड़ते हुए स्वयं को कर्मठ बनाए रखना चाहिए, जिसका जो भी कर्तव्य है, उसके प्रति जागरूक रहना चाहिए। इस प्रकार मोक्ष प्राप्ति की बाधाओं को पार कर व्यक्ति को मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए।

मंगल प्रवचन के उपरांत कार्यक्रम में चारित्रात्माओं की प्रस्तुति का क्रम जारी रहा। साध्वी सुप्रभा व साध्वी प्रमिला कुमार का सिंघाड़ा संयुक्त रूप से तथा साध्वी प्रज्ञावती, साध्वी शशिरेखा व साध्वी रचनाश्री के सिंघाड़ों ने पृथक-पृथक गीतों का संगान कर आचार्य की अभ्यर्थना की। मुनि सुमतिकुमार व मुनि पृथ्वीराज (जसोल) ने भी अपने हृदयोद्गार व्यक्त करते हुए आचार्य की अभ्यर्थना की। बड़ी संख्या में श्रावक साधु साध्वी गण उपस्थित रहे।

Published on:
11 Feb 2026 12:08 pm
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