
Afghanistan Cricket Team: अफगानिस्तान की क्रिकेट टीम ने पिछले डेढ़ दशक में, जिस तरह से फर्श से अर्श तक का सफर तय किया है, वह किसी चमत्कार से कम नहीं है। अफगानी टीम की इस तरक्की को देखकर क्रिकेट विशेषज्ञ भी हैरान हैं। ये टीम नेपाल और बांग्लादेश को काफी पीछे छोड़ चुकी है। भारत के अलावा ऐसी कोई एशियाई टीम नहीं है, जिसे उसने शिकस्त ना दी हो। इतना ही नहीं ये टीम न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया को भी मात दे चुकी है। अब अफगानिस्तान एक ऐसी टीम बन चुकी, जिसे दुनिया की शीर्ष टीमें हल्के में नहीं लेती हैं। घर में अभावों के बीच इस टीम ने कैसे दुनिया भर में सफलता के झंडे गाड़े इस सफर पर एक नजर डालते हैं।
अफगानिस्तान क्रिकेट की शुरुआत 80-90 के दशक में पाकिस्तान के शरणार्थी शिविरों से हुई थी। सोवियत आक्रमण और गृहयुद्ध से भागकर आए युवाओं ने सबसे पहले टेप बॉल और क्लब क्रिकेट खेलना सीखा। इसके बाद 1995 में अफगानिस्तान क्रिकेट बोर्ड बनाया गया और 2001 में उसे आईसीसी से अफिलिएट सदस्यता मिल गई। 2008 में वर्ल्ड क्रिकेट लीग डिवीजन-5 से शुरू करते हुए 2009 में वनडे स्टेटस हासिल किया। इसके छह साल बाद 2015 में पहला वर्ल्ड कप खेला, फिर 2017 में टेस्ट स्टेटस मिला। करीब डेढ दशक यह सफर उसके लिए अभूतपूर्व है। अफगानिस्तान युद्ध, फंड की कमी और मैदानों कमी के बावजूद तेजी से आगे बढ़ा। वहीं, बांग्लादेश 1977 से असोसिएट और 2000 से फुल मेंबर है, जबकि नेपाल अभी तक असोसिएट स्तर पर ही अटका पड़ा है।
अफगानी टीम की सबसे बड़ी ताकत उसका जोश, जुनून और एकता है। युद्धग्रस्त देश में क्रिकेट उम्मीद की किरण बना। यहां के खिलाड़ी गलतियों से सीखते हैं और सामरिक समझ में भारत-ऑस्ट्रेलिया के स्तर पर पहुंच गए हैं। जबकि, बांग्लादेश और पाकिस्तान में टीम अक्सर बिखरी नजर आती है।
स्पिन अटैक अफगानी टीम की सबसे बड़ी ताकत है। राशिद खान, मुजीब उर रहमान, मोहम्मद नबी और नूर अहमद दुनिया के बेहतरीन गेंदबाजों में हैं। राशिद आईसीसी वनडे बॉलिंग रैंकिंग में कई बार शीर्ष पर रहे हैं और टी20 इंटरनेशनल क्रिकेट में वह सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले खिलाड़ी हैं। तेज गेंदबाजी में भी फजलहक फारूकी और नवीन उल हक ने अपनी फिटनेस में काफी सुधार किया है।
फ्रैंचाइजी लीग खासकर आईपीएल ने अफगानी क्रिकेटर्स के जीवन में अहम भूमिका निभाई है। राशिद, गुरबाज, उमरजई और नूर अहमद नियमित रूप से खेलते हैं। इससे उन्हें अलग-अलग पिचों का अनुभव, कोचिंग और आत्मविश्वास मिला है। जबकि बांग्लादेश और नेपाल के प्लेयर्स इतना वैश्विक एक्सपोजर नहीं मिल सका।
अफगानिस्तान क्रिकेट टीम को फर्श से अर्श पर पहुंचाने में भारत का सहयोग महत्वपूर्ण है। ग्रेटर नोएडा और लखनऊ में होम ग्राउंड, स्टेडियम निर्माण, एसीसी फंडिंग में बढ़ोतरी (6% से 15%) और द्विपक्षीय मैचों ने उनकी हरसंभव मदद की। हालांकि, शुरुआती दिनों में पाकिस्तान के घरेलू सर्किट ने उन्हें आधार दिया था।
क्रिकेट वर्ल्ड कप 2023 में अफगानिस्तान की टीम ने 9 में से 4 मैच जीते थे, जिनमें उसने इंग्लैंड, पाकिस्तान, श्रीलंका, नीदरलैंड्स को शिकस्त दी थी। वहीं, बांग्लादेश और श्रीलंका की टीमें निचले पायदान पर रही थीं। 2024 टी20 वर्ल्ड कप में पाकिस्तान-श्रीलंका ग्रुप स्टेज से बाहर हो गए थे। वहीं, अफगानिस्तान न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसी शीर्ष टीमों को हराकर सेमीफाइनल तक पहुंचा था। अब, वह वनडे में एशिया की दूसरी-तीसरी सबसे बड़ी टीम है। हालांकि, अभी टेस्ट में अनुभव की कमी है।
बता दें कि बांग्लादेश के पास बड़ी आबादी, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और लंबे समय का अनुभव है, फिर भी सामरिक समझ और निरंतरता में पिछड़ गया है। नेपाल युवा प्रतिभाओं (संदीप लामिछाने आदि) और घरेलू सिस्टम से उठ रहा है, लेकिन फुल मेंबरशिप, नियमित टॉप टीमों से मुकाबला और लीग एक्सपोजर की कमी है। हालांकि, आईसीसी नेपाल को अगला अफगानिस्तान कह रहा है। लेकिऩ अफगान मॉडल शरणार्थी से शुरू होकर तेजी से आगे बढ़ा था।
अफगानिस्तान के लिए फंडिंग, सुरक्षा और घरेलू मैचों की कमी है। महिला क्रिकेट और टेस्ट में और सुधार जरूरी। फिर भी 20 साल से भी कम समय में अंडरडॉग से यहां तक पहुंचना सबसे प्रेरक अध्याय है। जुनून, सामरिक समझ, वैश्विक अनुभव और एकता, यही कारण हैं कि अफगानिस्तान नेपाल-बांग्लादेश से आगे निकलकर पाकिस्तान-श्रीलंका को टक्कर दे रहा है।