Sri Lanka 1996 ODI World Cup Victory: 17 मार्च 1996 को अंडरडॉग श्रीलंका ने लाहौर में ऑस्ट्रेलिया को 7 विकेट से हराकर अपना पहला और एकमात्र वन-डे विश्व कप जीता। ईडन गार्डन्स में भारतीय टीम के खिलाफ खेले गए सेमीफाइनल में भीड़ ने आगजनी की और बोतलें फेंककर हंगामा मचाया और मैच श्रीलंका को मिला।
Sri Lanka 1996 ODI World Cup Victory: लाहौर के गद्दाफी स्टेडियम में रोशनी जगमगा रही थी, दुनियाभर के क्रिकेट प्रेमी एक अप्रत्याशित फाइनल के गवाह बनने के लिए तैयार थे। फाइनल के बाद जो हुआ उसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। एक छोटा से देश श्रीलंका, जिसे टूर्नामेंट से पहले कोई गंभीरता से नहीं ले रहा था, उसने घातक ऑस्ट्रेलिया को पछाड़कर पहली बार विश्व कप की ट्रॉफी उठा ली। कप्तान अर्जुन रणतुंगे ने अपनी टीम से बहादुर योद्धाओं की तरह लड़ने को कहा था, और खिलाड़ियों ने ठीक वैसा ही किया।
लेकिन उसी विश्व कप में कोलकाता के ईडन गार्डन्स में एक ऐसी घटना भी घटी, जो कालांतर में भारतीय क्रिकेट के इतिहास में एक काले अध्याय की तरह देखी जाने लगी। आग की लपटें, गुस्साई भीड़ और मेजबान भारत का निराशाजनक प्रदर्शन, ये सब भी इसी कहानी का हिस्सा बन गए।
फाइनल में ऑस्ट्रेलिया ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 50 ओवर में 241/7 का स्कोर बनाया। मार्क टेलर ने 74 और रिकी पोंटिंग ने 45 रन की पारी खेली। श्रीलंका की ओर से अरविंद डी सिल्वा ने 3, तो वास, मुरलीधरन, धर्मसेना और जयसूर्या ने 1-1 विकेट झटके। अब लक्ष्य था 242 रन।
श्रीलंका ने जयसूर्या और कालूविथारना के विकेट जल्दी गंवा दिए। लेकिन वह दिन अरविंद डी सिल्वा का था। शानदार गेंदबाजी के बाद उन्होंने 124 गेंदों पर नाबाद 107 रन ठोके। असांका गुरुसिंहा (65) और रणतुंगे (47*) ने उनका बेहतरीन साथ निभाया। सिर्फ 46.2 ओवर में 245/3 बनाकर श्रीलंका ने 7 विकेट से जीत दर्ज की। यह विश्व कप फाइनल में पहली बार था जब किसी टीम ने लक्ष्य का पीछा करते हुए खिताब जीता। डी सिल्वा प्लेयर ऑफ द मैच बने। ट्रॉफी उठाते हुए रणतुंगा ने कहा था, "हमने साबित कर दिया कि छोटे देश भी अपने सपने पूरे कर सकते हैं।"
कोच डेव व्हाटमोर और कप्तान रणतुंगा की अगुवाई में टीम ने आक्रामक ओपनिंग का नया फॉर्मूला अपनाया, सनथ जयसूर्या और रोमेश कलुविथराना पावरप्ले में ताबड़तोड़ बल्लेबाजी करते थे और मैचों को शुरुआती 10 ओवरों में ही अपनी टीम के पक्ष में मोड़ने का प्रयास करते थे। कुछ बड़े उलटफेर और महत्वपूर्ण मैच इस प्रकार रहे:
ये जीतें सिर्फ स्कोर नहीं थी, बल्कि क्रिकेट की एक नई शैली का ऐलान थी। पूरे टूर्नामेंट में श्रीलंका ने किसी मौके पर हार नहीं मानी और ग्रुप ए में शीर्ष स्थान हासिल किया।
13 मार्च को कोलकाता के ईडन गार्डन्स में सेमीफाइनल खेला जा रहा था। श्रीलंका ने 251/8 का औसत स्कोर बनाया। भारत ने लक्ष्य का पीछा अच्छी शुरुआत के साथ किया और 98 रन के स्कोर तक सिर्फ एक विकेट खोया, लेकिन इसके बाद टीम अचानक ढह गई। सचिन के आउट होते ही विकेटों की झड़ी लग गई और देखते-ही-देखते भारत 34.1 ओवर में 120/8 पर सिमट गया।
इस प्रदर्शन से भीड़ में आक्रोश फैल गया। मैदान पर बोतलें और फल फेंके गए, स्टैंड्स में आग लगा दी गई। पवेलियन की छत तक धुआं उठने लगा। मैच रेफरी क्लाइव लॉयड ने करीब 15 मिनट तक खेल रुकवाकर स्थिति संभालने की कोशिश की, लेकिन हालात काबू में नहीं आए। आखिरकार मैच श्रीलंका को दे दिया गया। विनोद कांबली रोते हुए मैदान से बाहर जाते दिखे, जो तस्वीर आज भी दिल दहला देती है। उस दिन की आग सिर्फ स्टैंड्स में नहीं, बल्कि भारतीय क्रिकेट की उम्मीदों में भी लगी थी।
वहीं दूसरी ओर, श्रीलंका की टीम ने इस विवाद के बावजूद लाहौर पहुंचकर इतिहास रच दिया। अंडरडॉग से चैंपियन बनने की यह कहानी आज भी प्रेरणा देती है कि मेहनत और हौसला किसी भी तूफान से लड़ सकता है। 17 मार्च 1996, वह दिन जब क्रिकेट ने एक विवादित दौर से गुजरते हुए एक नया हीरो पाया।