MP News: गेहूं में रखी कीटनाशक दवा से निकली जहरीली गैस की वजह से बच्चों की मौत होने की बात आ रही सामने, डॉक्टर बोले कीटनाशक की गैस से मौत सामान्य नहीं, पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार।
MP News: मध्यप्रदेश के दमोह जिले के पथरिया थाना क्षेत्र जेरठ गांव से एक दुखद खबर सामने आई है। यहां शुक्रवार को मध्यप्रदेश के दमोह जिले के जेरठ गांव में दो बच्चों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई, जबकि एक महिला का इलाज जारी है। प्रारंभिक जांच में गेहूं में रखी कीटनाशक दवा से जहरीली गैस फैलने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि डॉक्टरों का कहना है कि मौत के वास्तविक कारण का पता पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही चल सकेगा।
मृतकों में 12 वर्षीय भावना और 7 वर्षीय समीर शामिल हैं। दोनों को शुक्रवार दोपहर जिला अस्पताल लाया गया था, जहां डॉक्टरों ने जांच के बाद मृत घोषित कर दिया। घटना के बाद गांव में मातम पसरा हुआ है। परिजनों के अनुसार जिस कमरे में परिवार रहता था, उसी में करीब 80 बोरी गेहूं रखा हुआ था। गेहूं में कीड़ों से बचाने के लिए आठ दिन पहले जहरीली दवा डाली गई थी। परिवार का कहना है कि संभवतः उसी दवा के प्रभाव या जहरीले वातावरण के कारण बच्चों की तबीयत बिगड़ी।
मृतका भावना के पिता दामोदर लोधी ने बताया कि गुरुवार शाम से ही बच्चों को उल्टी-दस्त की शिकायत शुरू हो गई थी। गांव में ही उपचार कराया गया, लेकिन हालत लगातार बिगड़ती गई। शुक्रवार दोपहर जब उन्हें जिला अस्पताल लाया गया, तब तक काफी देर हो चुकी थी। वहीं सात साल के बालक समीर के पिता डोमन लोधी ने बताया कि उनकी पत्नी विनीता की तबीयत भी दो दिन पहले बिगड़ी थी और उनका निजी अस्पताल में इलाज चल रहा है।
जिला अस्पताल में ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर बहादुर सिंह ने बताया कि मामला प्रथम दृष्टया पॉइजनिंग का प्रतीत होता है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि केवल दवा की गंध से मौत होना सामान्य नहीं माना जाता। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही मौत का वास्तविक कारण स्पष्ट हो सकेगा। डॉक्टर का कहना है कि बच्चे मृत अवस्था में अस्पताल पहुंचे थे। उधर जेरठ चौकी प्रभारी गोपाल सिंह ने बताया कि परिजनों के बयान दर्ज किए जा रहे हैं। शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है और मर्ग कायम कर जांच शुरू कर दी गई है।
इस घटना ने ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल दी है। जेरठ पंचायत में शासकीय स्वास्थ्य केंद्र होने के बावजूद वहां न डॉक्टर मौजूद रहते हैं और न ही नर्स। ग्रामीणों के मुताबिक अस्पताल ज्यादातर समय बंद रहता है और भवन केवल नाम मात्र का स्वास्थ्य केंद्र बनकर रह गया है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब बच्चों की तबीयत गुरुवार शाम से बिगड़ रही थी, तब गांव में प्राथमिक उपचार तक क्यों नहीं मिल पाया? यदि स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर या स्वास्थ्यकर्मी मौजूद होते, तो संभवतः बच्चों को समय रहते उपचार मिल सकता था। ग्रामीणों का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही ने दो मासूमों की जान ले ली। अब घटना के बाद प्रशासनिक अधिकारी जांच और कार्रवाई की बात कर रहे हैं।