
इस गुणकारी वृक्ष के फल से शरीर को मिलती है ये चीजें, देखकर ही आपके मुंह में भी आ जाएगा पानी
दंतेवाड़ा. बस्तर का जंगल और यहा के पेड़-पौधे हमेशा से सुिर्खयो में रहे है। आम, इमली, साल, सागौन के लंबे पेड़ जंगल की शोभा है। राजा और अंग्रेजो का शौक का गवाह खंडहर बंगले को एक विशालकाय पेड़ इंगित करता है। इसी के सामने से रास्ता राजा बंगलों को जाता है। भांसी के करीब मौजूद यह लीची का विशाल पेड़ औसतन लंबाई से कहीं अधिक है। इस पेड़ के बारे में स्थानीय लोग कहते हैं कि 100 साल से अधिक पुराना हो चुका है। जबकि लीची पेड़ की आयु औसतन 40 से 50 वर्ष है। वह भी तब जब देशी प्रजाति का हो। हाईब्रिड तो 20 से 25 साल में ही समाप्त हो जाता है। वैज्ञानिकों का मत है कि देशी प्रजाति के लीची पेड़ में एकाध पेड़ को इस तरह देखा जाता है।
सेवादारों ने रोपा था पौधा
भांसी के पास रहने वाले ग्रामीण मंगडू ने बताया कि इस पेड़ को उन्होंने इतना ही विशालकाय देखा है। मंगडू की उम्र करीब 70 वर्ष हो चुकी है। बुजुर्गों ने बताया कि राजा का लाव. लश्कर यहां से राजा बंगला के लिए गुजरता था। उनके सेवादार भांसी में विश्राम करते थे। उन्हीं में से किसी ने यहां लीची के पांच पौधे रोपे थे। चार पौधों की ऊंचाई औसतन है। एक पेड़ आम. इमली से भी बड़ा है। इसकी ऊंचाई करीब 100 फीट है। इस पेड़ से लीची का उत्पादन भी जबरदस्त होता है।
बस्तर में लीची के बागवानी की अपार संभावना
रायपुर के उद्यानिकी विशेषज्ञ कमल साहू ने लीची के पेड़ की औसतन हाइट 20 से 25 फीट बताई है। उनका कहना है कि देशी प्रजाति के पेड़ की भी इतनी लंबाई नहीं होती है। इस पेड़ की जड़ें जमीन में अधिक गहरी गई होंगी। इसलिए यह विशालकाय पेड़ हो गया। बस्तर लीची की बागवानी के लिए उपयुक्त जगह है। यहां इस पर बेहतर काम हो सकता है। बस्तर के बकावंड इलाके में लीची का बागवानी की जा रही है। देश में लीची की बागवानी सबसे अधिक बिहार में ही की जाती है। इसके अतिरिक्त देहरादून की घाटी उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र तथा झारखण्ड के छोटानागपुर क्षेत्र में की जाती है। फलों की गुणवत्ता के आधार पर अभी तक उत्तरी बिहार की लीची का स्थान प्रमुख है।
प्रोटीनयुक्त होते हैं लीची
लीची के फल अपने आकर्षक रंग, स्वाद और गुणवत्ता के कारण भारत ही नहीं बल्कि विश्व में अपना विशिष्ट स्थान बनाए हुए हैं। इसमें प्रचुर मात्राा में कैल्शियम पाया जाता है। इसके अलाव प्रोटीन, खनिज पदार्थ, फास्फोरस, विटामिन.सी इत्यादि पाए जाते हैं। इसका उपयोग डिब्बा बंद, स्क्वैश, कार्डियल, शिरप, आरटीएसए रस, लीची नट इत्यादि बनाने में किया जाता है। लीची के फल पूरे आकार तक आते हुए हरे होते जाते हैं। पुष्प छोटे हरित श्वेत या पीत श्वेत वर्ण के होते हैं। जो 30 सेमी लंबी पैनिकल पर लगते हैं। इसके अंदर एक मीठे दूधिया श्वेत गूदे वाली विटामिन. सी बहुल कुछ.कुछ छिले अंगूर सी मोटी पर्त इसके एकल भूरे चिकने मेवा जैसे बीज को ढंके होती है।