
Chamoli Tunnel Rescue Operation: उत्तराखंड के चमोली जिले में हाट-सियासैंण और मायापुर (पीपलकोटी) के पास टीएचडीसी की निर्माणाधीन टनल में हुए हादसे के बाद आखिरकार रेस्क्यू ऑपरेशन पूरा कर लिया गया है। 13 अगस्त को टनल के भीतर अचानक पानी और मलबा भरने से 22 श्रमिक फंस गए थे। इनमें से 12 मजदूरों को पहले ही सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया था, जबकि बाकी श्रमिकों की तलाश लगातार जारी थी।
रेस्क्यू टीमों ने अब दो और श्रमिकों के शव बरामद किए हैं। मृतकों की पहचान झारखंड निवासी लुकस टोपनो और छत्तीसगढ़ निवासी चेतन पोयाम के रूप में हुई है। दोनों शव मिलने के बाद हादसे में मरने वाले श्रमिकों की संख्या 10 हो गई है। इस तरह टनल में फंसे सभी 22 श्रमिकों का रेस्क्यू पूरा हो चुका है।
हादसे के बाद टनल के भीतर पानी और भारी मात्रा में मलबा भर गया था। बचाव टीमों के लिए सबसे बड़ी चुनौती पहले पानी का स्तर कम करना और फिर उसके नीचे जमा स्लज व मलबे को हटाकर आगे बढ़ना था। रेस्क्यू के दौरान पानी निकालने के लिए डिवाटरिंग पंप लगाए गए। जानकारी के मुताबिक 7 पंप लगातार पानी निकालने में लगाए गए थे, लेकिन पानी का रिसाव पूरी तरह बंद नहीं हुआ। यानी एक तरफ टीम पानी बाहर निकाल रही थी, तो दूसरी तरफ टनल के भीतर दोबारा पानी पहुंच रहा था। पानी कम होने के बाद भी मुश्किल खत्म नहीं हुई। टनल के कई हिस्सों में पानी और मिट्टी के मिश्रण से दलदल जैसी स्थिति बन गई थी। ऐसे में मशीनों और बचावकर्मियों को बेहद सावधानी से आगे बढ़ना पड़ा।
रेस्क्यू अभियान में करीब 125 लोगों की टीम जुटी रही। THDC, HCC, NDRF, SDRF, CISF, पुलिस और जिला प्रशासन की टीमें मिलकर काम कर रही थीं। टीमें अलग-अलग शिफ्ट में लगातार अभियान चलाती रहीं। टनल के भीतर मीडिया की एंट्री भी रोक दी गई थी, ताकि बचाव कार्य प्रभावित न हो। पानी की निकासी के लिए पंप और मलबा हटाने के लिए जेसीबी समेत दूसरे उपकरणों का इस्तेमाल किया गया। प्रशासन की निगरानी में अलग-अलग एजेंसियों के बीच समन्वय बनाकर अभियान आगे बढ़ाया गया।
THDC के अनुसार हादसे के दौरान करीब 1440 मीटर चेनज पर अचानक तेज आवाज के साथ बड़ी मात्रा में पानी और मलबा टनल में आ गया था। हालांकि पानी और मलबे का वास्तविक स्रोत क्या था, इसकी पूरी तस्वीर अभी स्पष्ट नहीं है। कुछ जानकारी में टनल के करीब 1500 मीटर अंदर पहले भी धंसाव होने की बात सामने आई है। हालांकि उसका 13 अगस्त की घटना से सीधा संबंध था या नहीं, इसकी अभी पुष्टि नहीं हुई है। हादसे की तकनीकी वजहों की विस्तृत जांच आगे की जाएगी।
विष्णुगाड़-पीपलकोटी परियोजना की टनल पहाड़ के भीतर बनाई जा रही है। इस क्षेत्र में मौजूद ग्रेनाइट एक कठोर क्रिस्टलाइन चट्टान है। आमतौर पर ऐसी चट्टानों में पानी का प्रवाह आसान नहीं होता, लेकिन प्राकृतिक फ्रैक्चर, दरार और जॉइंट पानी के लिए रास्ता बना सकते हैं। यानी पहाड़ ऊपर से कितना भी मजबूत नजर आए, उसके भीतर मौजूद दरारों में पानी जमा हो सकता है। इन्हीं प्राकृतिक रास्तों से पानी टनल के अंदर पहुंचने की संभावना रहती है। USGS के अध्ययनों में भी क्रिस्टलाइन चट्टानों में पानी के प्रवाह को फ्रैक्चर और जॉइंट से जुड़ा बताया गया है।
रेस्क्यू टीमों के लिए सिर्फ पानी निकालना ही चुनौती नहीं था। पानी घटने के बाद नीचे जमा मलबा और कीचड़ रास्ता रोक रहा था। कई हिस्सों में जमीन दलदल जैसी हो गई थी। ऐसी स्थिति में बचावकर्मी सामान्य तरीके से आगे नहीं बढ़ सकते थे। हर कदम पर नीचे की स्थिति का अंदाजा लगाना पड़ रहा था। ऊपर से पानी का रिसाव जारी रहने के कारण खतरा बना हुआ था। रेस्क्यू के दौरान सामने आए वीडियो में भी बचावकर्मी टनल के भीतर सीमित रोशनी में मलबे के बीच तलाश करते दिखाई दिए। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अंदर तक पहुंचना टीमों के लिए कितना चुनौतीपूर्ण रहा होगा।
13 अगस्त को हुए हादसे के बाद टनल में फंसे 22 श्रमिकों में से 12 को सुरक्षित बाहर निकाला गया, जबकि 10 की मौत हो गई। दो और शव मिलने के साथ अब सभी श्रमिकों की तलाश पूरी हो गई है। फिलहाल हादसे की तकनीकी वजहों की विस्तृत जांच बाकी है। पानी और मलबा अचानक टनल में क्यों आया, क्या पहले से कोई भूगर्भीय जोखिम मौजूद था और हादसे को टाला जा सकता था या नहीं, इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही स्पष्ट होंगे।