
Surya Gochar: श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर नागपंचमी का पर्व 17 अगस्त को मनाया जाएगा। यह दिन शुभ और दुर्लभ संयोगों के साथ आ रहा है। इस दिन देश के बड़े नाग मंदिरों में से एक धर्म नगरी उज्जैन में स्थित श्री नागचंद्रेश्वर मंदिर (Nagchandreshwar Temple) के वर्ष में केवल एक बार होने वाले दर्शन के साथ भगवान महाकालेश्वर की तीसरी सवारी, रवि योग और सूर्य का सिंह राशि में प्रवेश का अनूठा योग बन रहा है। देश-विदेश से आने वाले लाखों श्रद्धालुओं की सुविधा और सुगम दर्शन के लिए महाकालेश्वर मंदिर आते है लेकिन नाग पंचमी के दिन यहां भक्तों का तांता लग जाता है।
मध्य मालव प्रांत और मेवाड़ मारवाड़ क्षेत्र में नागपंचमी (Nag Panchami 2026) पर घरों की दीवारों पर नाग-नागिन के जोड़े और श्रवण की आकृति बनाकर परंपरागत पूजन की परंपरा है। इसके अलावा मिट्टी के नाग या बांबी (मिट्टी के ढेर) के पूजन का विशेष महत्व है। स्कंद पुराण के अवंती खंड के अनुसार, उज्जैन में चारों दिशाओं में रक्षक के रूप में नाग देवताओं का उल्लेख है। अवंतिका क्षेत्र में स्थित नाग तीर्थों में रामघाट पर गायत्री मंदिर की सीढ़ी पर अंकित प्राचीन नाग शिला तथा रामघाट धर्मशाला के समीप स्थित नाग मंदिर अत्यंत मान्यता प्राप्त स्थान है, जहां पूजन से सभी ज्ञात-अज्ञात दोषों का शमन होता है।
ज्योतिषाचार्य पं. अमर डब्बावाला ने बताया कि ज्योतिषीय गणना के अनुसार, इस बार नागपंचमी का पर्व सोमवार के दिन चित्रा नक्षत्र, शुभ योग, बालव करण और कन्या राशि के चंद्रमा की साक्षी में आ रहा है। इसी दिन सुबह 8 बजे सूर्य देव कर्क राशि से निकलकर अपनी स्व राशि सिंह में प्रवेश करेंगे, जिससे प्राकृतिक और मौसमी बदलाव देखने को मिलेंगे। वहीं रात्रि 8 बजे अगस्त्य तारे का उदय होगा। धर्मशास्त्रों के अनुसार रवि योग और पंचमी तिथि के संयोग में नाग पूजन करने से जन्म कुंडली के नाग दोष, राहु-केतु के प्रभाव और सर्प दोष से मुक्ति मिलती है। इससे मानसिक शांति, कार्य-बाधा निवारण और पारिवारिक सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
सावन माह भगवान शिव की आराधना के साथ नाग देवता की पूजा के लिए भी खास माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस महीने नाग पूजा का विशेष महत्व रहता है।सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। घर के मुख्य द्वार या दीवार पर गोबर, गेरू, हल्दी या कुमकुम से नाग देवता का चित्र बनाएं। इसके बाद जल, कच्चा दूध, हल्दी, रोली, अक्षत, फूल और मिठाई का भोग अर्पित कर दीपक जलाएं। पूजन के दौरान इस मंत्र का पाठ करें।
''सर्वे नागाः प्रीयन्तां मे ये केचित् पृथिवीतले। ये च हेलिमरीचिस्था ये च दिवि संस्थिताः॥
ये नदीषु महानागा ये सरस्वतिगामिनः। ये च वापीतडगेषु तेषु सर्वेषु वै नमः।।''